कहीं दामाद तो कहीं पूर्वज! दशहरे पर इन जगहों में रावण की होती है पूजा
सनातन संस्कृति और पर्व-त्योहारों की फेहरिस्त में 'विशाल विजय दशमी' यानी दशहरा (Dussehra 2026) का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में पूरे भारतवर्ष में अत्यंत उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हमारे देश के अधिकांश हिस्सों में इस पावन अवसर पर भव्य मेलों का आयोजन होता है, आसमान में आतिशबाजी गूंजती है और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाथ के विशालकाय पुतलों का दहन किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत भूमि में कुछ ऐसे भी जादुई और ऐतिहासिक स्थान मौजूद हैं जहाँ रावण का पुतला फूंकने की कोई परंपरा नहीं है, बल्कि इसके ठीक विपरीत कुछ जगहों पर रावण को एक ज्ञानी और पूजनीय पात्र के रूप में देखा जाता है? इतना ही नहीं, देश का एक हिस्सा ऐसा भी है जहाँ दशहरा महज़ एक दिन का नहीं बल्कि पूरे 75 दिनों तक चलने वाला दुनिया का सबसे लंबा लोक उत्सव माना जाता है। आइए एक सांस्कृतिक और ग्राउंड रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि भारत के इन अलग-अलग कोनों में दशहरा मनाने की ये अनोखी और हैरान करने वाली परंपराएं क्या हैं।
बस्तर का विश्व प्रसिद्ध 75 दिवसीय दशहरा: जहाँ रावण दहन नहीं बल्कि होती है मां दंतेश्वरी की आराधना
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर संभाग में मनाया जाने वाला दशहरा उत्सव दुनिया भर में अपनी अनूठी संस्कृति और लंबी अवधि के लिए अद्वितीय माना जाता है। देश के बाकी हिस्सों में जहाँ दशहरा रावण वध के साथ समाप्त हो जाता है, वहीं बस्तर में यह पर्व कुल 75 दिनों तक लगातार चलता है। इस विशाल उत्सव की शुरुआत श्रावण मास की अमावस्या से होती है और यह अश्विन मास की पूर्णिमा तक विभिन्न पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ आगे बढ़ता है। बस्तर के इस ऐतिहासिक दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रावण दहन या रामलीला का मंचन जैसी कोई परंपरा नहीं है। इस दौरान आदिवासी समाज के लोग अपनी आराध्य देवी 'मां दंतेश्वरी' को समर्पित विशेष रथ यात्रा निकालते हैं, जिसमें राजा पखाड़ और स्थानीय देवी-देवताओं के छत्र शामिल होते हैं। यह 75 दिनों का लंबा उत्सव आदिवासी संस्कृति, लोक नृत्यों, पारंपरिक आस्था और भाईचारे का एक ऐसा अद्भुत संगम है जिसे देखने के लिए विदेशी सैलानी भी खींचे चले आते हैं।
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का अंतरराष्ट्रीय दशहरा: जहाँ देवताओं के मिलन से सजती है घाटी
हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में स्थित कुल्लू का दशहरा (Kullu Dussehra) अपने आप में एक अलग और भव्य अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। यहाँ विजयादशमी के दिन से दशहरे के मुख्य पर्व की औपचारिक शुरुआत होती है, जो अगले सात दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। कुल्लू के ढालपुर मैदान में मनाए जाने वाले इस दशहरे की शुरुआत भगवान रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा के साथ होती है। यहाँ की परंपरा के अनुसार, इस पूरे उत्सव के दौरान घाटी के सैकड़ों देवी-देवताओं को पालकियों में बैठाकर ढालपुर मैदान में लाया जाता है, जहाँ वे भगवान रघुनाथ को नमन करते हैं। कुल्लू में भी रावण दहन की वह आम प्रथा नहीं होती जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में देखने को मिलती है, बल्कि यहाँ इस उत्सव को देवताओं के मिलन, मेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोक संगीत के महाकुंभ के रूप में मनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश के बिसरख गांव की कहानी: जहाँ रावण को माना जाता है परम ज्ञानी और नहीं जलता उसका पुतला
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित 'बिसरख' (Bisrakh Village) नामक गांव को लंकेश रावण का जन्मस्थान माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण के पिता विश्रवा ऋषि ने इसी स्थान पर तपस्या की थी और रावण का बचपन यहीं बीता था। इस ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यता के चलते बिसरख गांव के लोग रावण को अपना स्थानीय कुलपुत्र और प्रकांड पंडित मानते हैं। यही कारण है कि इस गांव में आज तक कभी भी विजयादशमी के दिन रावण का पुतला नहीं जलाया गया है। जब देश के बाकी हिस्सों में लोग रावण दहन की खुशियां मना रहे होते हैं, तब इस गांव के लोग शोक व्यक्त करते हैं या रावण की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए पूजा-पाठ करते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि रावण जैसे ज्ञानी और शिव भक्त का पुतला दहन करना उनके गांव के लिए अशुभ हो सकता है।
मध्य प्रदेश के मंदसौर और कानपुर में रावण की पूजा और महिलाओं द्वारा विलाप की रस्म
मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में भी रावण के प्रति सम्मान और श्रद्धा की एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंदसौर (जिसे प्राचीन काल में दशपुर कहा जाता था) रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका था। इस रिश्ते के चलते मंदसौर के कई हिस्सों में रावण को दामाद का दर्जा दिया जाता है। यहाँ रावण की एक विशाल मूर्ति स्थापित है, जहाँ कई लोग विजयादशमी के दिन उनकी पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में भी रावण का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है जो साल में सिर्फ साल में एक बार यानी दशहरे के दिन ही खुलता है। इस दिन यहाँ के स्थानीय लोग रावण के मंदिर में जाकर दीया जलाते हैं, उसकी आरती करते हैं और उसके महाविद्वान होने की स्तुति करते हैं। इसी तरह, राजस्थान के जोधपुर में भी कुछ ऐसे ब्राह्मण परिवार हैं जो खुद को रावण का वंशज मानते हैं और दशहरे के दिन रावण का श्राद्ध तथा तर्पण करते हैं।
विविधता में एकता का संदेश देता भारत का यह अनोखा और सांस्कृतिक उत्सव
भारत की यह खूबसूरती ही है कि यहाँ एक ही त्योहार को अलग-अलग राज्यों और संस्कृतियों में अपने-अपने प्राचीन विश्वासों और लोक कथाओं के अनुसार मनाया जाता है। जहाँ एक तरफ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने के लिए रावण दहन की परंपरा सनातन धर्म का आधार है, वहीं दूसरी तरफ कुछ स्थानों पर रावण के विद्वान पक्ष और पौराणिक इतिहास का सम्मान भी किया जाता है। दशहरा का यह पर्व हमें यह सिखाता है कि हर परंपरा के पीछे कोई न कोई गहरा सामाजिक या ऐतिहासिक संदेश छिपा होता है, जो हमारी इस महान संस्कृति को दुनिया में सबसे अलग और जीवंत बनाता है।