Toxic Chemicals in Medicine : खाँसी के सीरप में मिला धीमा ज़हर? कैसे एक दवा बन रही बच्चों की जान की दुश्मन

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News India Live, Digital Desk: Toxic Chemicals in Medicine : अरे, सुना आपने मध्य प्रदेश की एक बेहद दुखद ख़बर के बारे में? मंदसौर में कोल्डरिफ (Coldrif) नाम के एक कफ सिरप ने एक मासूम बच्चे की जान ले ली. यह सुनकर वाकई दिल दहल जाता है. क्या आपको पता है कि ऐसी घटनाएँ पहले भी हो चुकी हैं और इनकी जड़ में अक्सर एक खतरनाक केमिकल होता है, जिसका नाम है डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (Diethylene Glycol या DEG)? ये दवाइयों में कैसे आ जाता है और क्यों ये इतना जानलेवा होता है, आइए इसी बारे में थोड़ी बात करते हैं.

क्या है ये कोल्डरिफ सिरप विवाद?
दरअसल, मध्य प्रदेश में एक आठ महीने के बच्चे की मौत के बाद हड़कंप मच गया है. पता चला कि उस बच्चे ने कोल्डरिफ नाम का एक कफ सिरप पिया था. शुरुआती जांच में इसमें डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) नाम का जहरीला केमिकल पाया गया. यह वही केमिकल है जो पहले भी कई देशों में बच्चों की मौतों का कारण बन चुका है. सोचिए, जिस दवा को हम अपने बच्चों को ठीक करने के लिए देते हैं, वो ही उनकी जान की दुश्मन बन जाए!

डायएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) - मीठा ज़हर जो दवाइयों में नहीं होना चाहिए

डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) एक रंगहीन, गंधहीन तरल होता है जिसका स्वाद हल्का मीठा होता है. इसकी खासियत यह है कि यह एक अच्छा घोलक (solvent) है, मतलब कई चीज़ों को आसानी से घोल देता है. औद्योगिक स्तर पर इसका उपयोग एंटीफ्रीज़, ब्रेक फ्लूइड, स्याही, और कुछ प्लास्टिक बनाने में होता है. लेकिन, यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि यह इंसानों के पीने के लिए या दवाइयों में इस्तेमाल करने के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है.

तो फिर ये दवाइयों में आता क्यों है?
अक्सर ये केमिकल दवाइयों में गलती से या धोखे से मिल जाता है. आमतौर पर, खांसी के सिरप या अन्य तरल दवाइयों में ग्लिसरीन (Glycerin) या प्रोपाइलीन ग्लाइकॉल (Propylene Glycol) का उपयोग होता है, जो दवाइयों को घोलने में मदद करते हैं और सुरक्षित होते हैं. दुर्भाग्य से, कुछ लालची या गैर-जिम्मेदार लोग इन सुरक्षित विकल्पों की जगह सस्ते और जहरीले डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) का इस्तेमाल कर लेते हैं. इसकी कीमत बहुत कम होती है, जिससे उत्पाद बनाने वाले का मुनाफा बढ़ जाता है, लेकिन इसकी कीमत मासूम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है.

यह इतना ज़हरीला क्यों है?
जैसे ही कोई डाइएथिलीन ग्लाइकॉल युक्त दवा पीता है, यह केमिकल शरीर में जाते ही लिवर, किडनी और दिमाग पर सीधा हमला करता है. यह मुख्य रूप से किडनी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है और उसे काम करना बंद करवा देता है. इसकी ज़हर के कुछ लक्षण हैं:

  • तेज पेट दर्द
  • उल्टी और दस्त
  • मूत्र त्याग में कमी या पूरी तरह रुक जाना
  • गुर्दे फेल होना (Kidney Failure)
  • मानसिक स्थिति में बदलाव
  • और अंततः, मृत्यु.

खास बात ये है कि बच्चों और वयस्कों, दोनों के लिए इसकी बहुत कम मात्रा भी घातक हो सकती है.

ये कोई नई बात नहीं है!
ऐसी घटनाएँ पहली बार नहीं हुई हैं. पिछले कुछ दशकों में कई देशों में (जैसे 1985 में अमेरिका, 1996 में हैती, 2006 में पनामा, और हाल ही में गाम्बिया व उज्बेकिस्तान) डाइएथिलीन ग्लाइकॉल से दूषित दवाइयों के कारण सैकड़ों मौतें हुई हैं. इन घटनाओं ने हर बार दवा गुणवत्ता नियंत्रण पर बड़े सवाल उठाए हैं.

भारत में भी ऐसे मामले पहले आ चुके हैं और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) लगातार इस पर निगरानी रखने और कड़े कदम उठाने की कोशिश करता रहता है. लेकिन फिर भी ऐसी दुखद खबरें यह दिखाती हैं कि सिस्टम में कहीं न कहीं खामियां हैं, जिन्हें दूर करना बहुत ज़रूरी है ताकि भविष्य में कोई और मासूम इसकी बलि न चढ़े.

हमारी और आपके सभी अपनों की सेहत के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम कोई भी दवा लेते समय सतर्क रहें, विश्वसनीय ब्रांड्स की ही दवाइयां खरीदें और एक्सपायरी डेट हमेशा जांच लें. और हाँ, कोई भी कफ सिरप या दवा अपने डॉक्टर या फार्मासिस्ट से पूछकर ही दें, खासकर बच्चों के लिए. आखिर बच्चों की जान से ज़्यादा कीमती कुछ भी नहीं है.