दिल्ली ब्लास्ट के आरोप से बरी हुए डॉक्टर के साथ ऐसा सुलूक, कहानी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी
News India Live, Digital Desk: क्या अदालत से बरी हो जाना भी किसी के बेगुनाह होने का सबूत नहीं है? यह सवाल आज मेरठ के लाला लाजपत राय मेमोरियल (LLRM) मेडिकल कॉलेज में गूंज रहा है। यहां एक डॉक्टर हैं, डॉ. शाहीन। सालों पहले उनका नाम 2005 में हुए दिल्ली सीरियल ब्लास्ट से जुड़ा था। एक लंबी और मुश्किल कानूनी लड़ाई के बाद, अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बाइज़्ज़त बरी कर दिया। लेकिन ऐसा लगता है कि जिस सिस्टम में वह काम करते हैं, वह आज भी उन्हें शक की निगाह से देखता है।
जब एक डॉक्टर के नाम पर पोत दी गई सफेदी
डॉ. शाहीन मेरठ मेडिकल कॉलेज के रेडियोलॉजी विभाग में काम करते हैं। हाल ही में कुछ ऐसा हुआ जिसने उन्हें और उनके समर्थकों को झकझोर कर रख दिया। विभाग के बाहर लगे बोर्ड से किसी ने उनके नाम को मिटाकर उस पर सफेदी पोत दी। यह सिर्फ एक नाम मिटाना नहीं था, बल्कि उस सम्मान पर हमला था जिसे उन्होंने सालों की लड़ाई के बाद वापस पाया था।
जब यह मामला सामने आया, तो डॉ. शाहीन ने इसकी शिकायत मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल से लेकर शासन के बड़े अधिकारियों तक की। उनका कहना है कि उन्हें जानबूझकर परेशान किया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
डॉ. शाहीन की मूल तैनाती बिजनौर में थी, लेकिन वह पिछले काफी समय से मेरठ के LLRM मेडिकल कॉलेज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दिल्ली ब्लास्ट मामले में बरी होने के बाद, उन्होंने मेरठ में ही काम करना जारी रखा। लेकिन अब मेडिकल कॉलेज प्रशासन उन्हें वापस बिजनौर भेजने की कोशिश कर रहा है। प्रशासन का कहना है कि उनकी मूल तैनाती वहीं की है, इसलिए उन्हें वहां वापस जाना चाहिए।
वहीं, डॉ. शाहीन इसे अपने उत्पीड़न से जोड़कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि ब्लास्ट केस के दाग से छुटकारा पाने के बाद भी, कुछ लोग उन्हें यहां से हटाना चाहते हैं। नाम मिटाने की घटना को भी वह इसी साजिश का हिस्सा मानते हैं।
क्या कहता है कॉलेज प्रशासन?
जब इस बारे में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आर. सी. गुप्ता से बात की गई, तो उन्होंने इस घटना से अनभिज्ञता जताई। उन्होंने कहा, "मुझे नाम पर सफेदी पोतने की जानकारी नहीं है। मैं इस मामले को दिखवाता हूँ।" डॉ. शाहीन के तबादले पर उन्होंने कहा, "उनकी मूल तैनाती बिजनौर में है और शासन स्तर से उन्हें वहां भेजने की प्रक्रिया चल रही है।"
एक तरफ अदालत का फैसला है, जो डॉ. शाहीन को निर्दोष बताता है। दूसरी तरफ एक सिस्टम है, जो शायद आज भी उन्हें पूरी तरह से अपना नहीं पा रहा है। यह लड़ाई सिर्फ एक नौकरी या तबादले की नहीं है, बल्कि उस सम्मान और सामान्य जीवन की है, जिसके लिए डॉ. शाहीन ने अपनी जिंदगी के कई कीमती साल अदालतों में बिता दिए। अब देखना यह है कि उनकी यह नई लड़ाई उन्हें कहां ले जाती है।