संघ का 'शांति संदेश'! जब कश्मीर की दरगाह पर RSS नेता ने मांगी अमन-चैन की दुआ, जानें क्या हैं इसके गहरे मायने

Post

जम्मू-कश्मीर, जो अक्सर अपनी राजनीतिक और संवेदनशील सुर्खियों के लिए जाना जाता है, हाल ही में एक ऐसी अनोखी और सकारात्मक तस्वीर का गवाह बना जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ प्रचारक और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संरक्षक, इंद्रेश कुमार, ने श्रीनगर स्थित एक प्रसिद्ध सूफी दरगाह पर हाजिरी दी और वहां अमन-चैन, भाईचारे और सद्भाव की दुआ मांगी।

यह सिर्फ एक नेता का किसी इबादतगाह का दौरा नहीं था, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक और सामाजिक मायने हैं। एक ऐसे संगठन के वरिष्ठ नेता का, जिसे अक्सर एक विशेष विचारधारा के चश्मे से देखा जाता है, कश्मीर की एक सूफी दरगाह पर जाना और वहां से 'इंसानियत' का पैगाम देना, अपने आप में एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण घटना है। इस कदम को संघ की बदलती रणनीति और कश्मीर में शांति बहाली की कोशिशों के एक अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

 

'बांटने वाली ताकत शैतानी है': इंद्रेश कुमार का दिल जीतने वाला संदेश

दरगाह पर चादर चढ़ाने और दुआ मांगने के बाद, इंद्रेश कुमार ने वहां मौजूद लोगों और मीडिया से बातचीत की। उन्होंने जो संदेश दिया, वह सीधे दिल में उतरने वाला था।

उनके भाषण के मुख्य बिंदु:

  • हर धर्म सिखाता है इंसानियत: उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया का कोई भी धर्म नफरत, हिंसा या टकराव नहीं सिखाता। हर धर्म की बुनियाद और अंतिम लक्ष्य इंसानियत, प्रेम और भाईचारा ही है।
  • भाईचारा और सद्भाव ही हमारा लक्ष्य: उन्होंने कहा, "हम सभी की यही प्रार्थना और कोशिश होनी चाहिए कि हमारे देश में और पूरी दुनिया में शांति, सद्भाव और भाईचारा कायम हो।"
  • विभाजनकारी शक्तियों पर हमला: उन्होंने एक बेहद शक्तिशाली बयान देते हुए कहा, "जो ताकतें धर्म, जाति या क्षेत्र के नाम पर इंसानों को बांटने का काम करती हैं, वे शैतानी ताकतें हैं। हमें उनसे सावधान रहना होगा।"

उनका यह बयान उस नफरती सोच पर सीधा प्रहार था, जो अक्सर समाज में जहर घोलने का काम करती है।

 

क्यों अहम है RSS नेता का यह दरगाह दौरा?

इस दौरे के महत्व को समझने के लिए हमें कुछ बातों पर गौर करना होगा:

1. कश्मीर और सूफी परंपरा: कश्मीर घाटी को सदियों से सूफियों और ऋषियों की भूमि कहा जाता रहा है। सूफीवाद इस्लाम का एक ऐसा रहस्यमय और उदारवादी पंथ है जो हमेशा से प्रेम, शांति और ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ समर्पण पर जोर देता है। कश्मीर की संस्कृति में हिंदू और मुस्लिम परंपराओं का जो संगम देखने को मिलता है, उसकी जड़ों में यह सूफी परंपरा ही है। इंद्रेश कुमार का एक सूफी दरगाह पर जाना, कश्मीर की इसी साझी विरासत और संस्कृति को एक सम्मान देने जैसा है।

2. बदलती धारणाएं और संघ का प्रयास: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पिछले कुछ समय से लगातार मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बीच अपनी पैठ बनाने और उनके बारे में बनी-बनाई धारणाओं को तोड़ने का प्रयास कर रहा है। इंद्रेश कुमार का मुस्लिम राष्ट्रीय मंच इसी दिशा में एक बड़ा मंच है। उनका यह कदम संघ के उसी 'आउटरीच' कार्यक्रम का एक हिस्सा है, जिसके तहत वह यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए काम करता है।

3. अनुच्छेद 370 के बाद का कश्मीर: 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद, केंद्र सरकार लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रही ਹੈ कि कश्मीर में हालात सामान्य हो रहे हैं और विकास की एक नई बयार बह रही है। ऐसे में, संघ के एक बड़े नेता का श्रीनगर जाकर शांति और भाईचारे का संदेश देना, इसी नैरेटिव को और मजबूत करता ਹੈ। यह एक संकेत है कि अब राजनीतिक बदलाव के बाद सामाजिक और दिलों को जोड़ने की प्रक्रिया पर भी जोर दिया जा रहा है।

 

इंद्रेश कुमार का यह कदम एक छोटी सी पहल लग सकता है, लेकिन इसके द्वारा दिया गया संदेश बहुत बड़ा ਹੈ। यह न केवल विभिन्न समुदायों के बीच संवाद के नए द्वार खोलता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि बातचीत और एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करके सबसे जटिल मुद्दों का भी हल निकाला जा सकता ਹੈ और एक शांतिपूर्ण भविष्य की नींव रखी जा सकती है।