The Mysterious journey of the Soul : मृत्यु के बाद प्रेत लोक से पितृ लोक तक कैसे पहुंचती है रूह? गरुड़ पुराण में छिपा है कर्मों का पूरा हिसाब
News India Live, Digital Desk: The Mysterious journey of the Soul : मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है?" यह एक ऐसा सवाल है जो सदियों से इंसान के मन में कौंधता रहा है. क्या सच में कोई दूसरा लोक है? क्या हमारे कर्मों का हिसाब होता है? हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथ 'गरुड़ पुराण' में इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से दिए गए हैं. इसमें बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा प्रेत बनकर भटकती है और फिर कैसे श्राद्ध कर्मों के जरिए उसे पितृ लोक में स्थान मिलता है.
आइए, समझते हैं आत्मा के इस रहस्यमयी और अनदेखे सफर को.
क्यों बनना पड़ता है 'प्रेत'?
गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसका स्थूल शरीर तो यहीं रह जाता है, लेकिन आत्मा यमदूतों के साथ यमलोक की यात्रा पर निकल जाती है. वहां उसके जीवन भर के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा देखा जाता है. कहते हैं कि अपने कर्मों का फल भोगने और सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त होने तक आत्मा को एक वायवीय शरीर (हवा का शरीर) में रहना पड़ता है, जिसे 'प्रेत' कहा जाता है.
यह आत्मा अपने परिवार, अपनी चीजों और अपने अधूरे कामों के मोह में फंसी रहती है. उसे भूख-प्यास भी लगती है, लेकिन वह कुछ खा-पी नहीं सकती. यह एक बहुत ही कष्टकारी अवस्था होती है.
कैसे मिलता है प्रेत योनि से छुटकारा?
इसी कष्टकारी प्रेत योनि से आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए 'श्राद्ध' और 'पिंड दान' की परंपरा बनाई गई है. जब परिवार के लोग अपने मृत परिजन के लिए श्रद्धा से पिंडदान करते हैं, तो आत्मा को उससे तृप्ति और ऊर्जा मिलती है. यह पिंडदान उस आत्मा के लिए एक तरह का भोजन और सहारा होता है.
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि परिवार द्वारा किए गए श्राद्ध कर्म ही आत्मा को प्रेत लोक की पीड़ा से निकालकर पितृ लोक के दरवाजे तक पहुंचाते हैं. जब तक आत्मा के नाम से पिंडदान नहीं किया जाता, वह प्रेत बनकर भटकती रहती है.
क्या है पितृ लोक का महत्व?
पितृ लोक वह स्थान है जहां हमारे पूर्वज निवास करते हैं. यह एक दिव्य लोक है जहां आत्माएं शांति से रहती हैं. जब श्राद्ध कर्मों के जरिए आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है, तो वह अपने पूर्वजों के पास पितृ लोक में चली जाती है और पितर बन जाती है. पितृ लोक में पहुंचकर ही आत्मा को असली शांति और सद्गति प्राप्त होती है. वहां से वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं.
अगर किसी व्यक्ति के कर्म बहुत अच्छे होते हैं, तो उसे सीधे देव लोक या मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है. लेकिन ज्यादातर आत्माओं को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इसलिए, हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष को इतना महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यही वह समय है जब हम अपने पूर्वजों को प्रेत योनि के कष्टों से मुक्ति दिलाकर उन्हें पितृ लोक में स्थान दिलाने में मदद करते हैं.