भोजपुरी सिनेमा का वो सुनहरा दौर: जब अमिताभ-हेमा की 'गंगा' ने बॉक्स ऑफिस पर मचाया था गदर, बजट से 7 गुना ज्यादा की थी कमाई
मुंबई: भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी क्षेत्रीय फिल्मों की सफलता की गाथा लिखी जाएगी, साल 2006 में आई भोजपुरी फिल्म ‘गंगा’ का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा। अक्सर लोग मानते हैं कि भोजपुरी इंडस्ट्री ने हाल के वर्षों में तरक्की की है, लेकिन 'गंगा' ने दो दशक पहले ही साबित कर दिया था कि दमदार कहानी और बड़े सितारों के मेल से क्षेत्रीय सिनेमा भी बॉलीवुड को टक्कर दे सकता है।
महानायक और ड्रीम गर्ल का भोजपुरी अवतार
इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी अविश्वसनीय स्टारकास्ट थी। हिंदी सिनेमा के शहंशाह अमिताभ बच्चन और ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी को एक साथ भोजपुरी पर्दे पर देखना दर्शकों के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। फिल्म में इनके साथ उस दौर के भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन, मनोज तिवारी और खूबसूरत अभिनेत्री नगमा भी मुख्य भूमिकाओं में थे। इतने बड़े दिग्गजों का एक फ्रेम में होना ही फिल्म की सफलता की पहली गारंटी बन गया था।
रिश्तों की खातिर 'बिग बी' ने भरी थी हामी
अभिषेक चड्ढा के निर्देशन में बनी इस फिल्म के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। फिल्म के प्रोड्यूसर दीपक सावंत थे, जो लंबे समय तक अमिताभ बच्चन के पर्सनल मेकअप आर्टिस्ट रहे हैं। कहा जाता है कि दीपक सावंत के साथ अपने पुराने और गहरे रिश्तों की खातिर ही बच्चन साहब ने इस भोजपुरी प्रोजेक्ट के लिए तुरंत हां कर दी थी। फिल्म 2006 में रिलीज हुई और देखते ही देखते यूपी-बिहार के सिनेमाघरों में 'हाउसफुल' के बोर्ड लग गए।
5 करोड़ का बजट और 35 करोड़ की छप्परफाड़ कमाई
फिल्म 'गंगा' ने बिजनेस के मामले में उस समय के कई बॉलीवुड रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह फिल्म महज 5 करोड़ रुपये के बजट में तैयार हुई थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इसने लगभग 35 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया। अपने बजट से 7 गुना ज्यादा कमाई करना किसी भी फिल्म के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाती है। इस मुनाफे ने साबित कर दिया कि भोजपुरी दर्शकों में बड़े सितारों को अपनी भाषा में देखने की कितनी जबरदस्त ललक है।
इंसाफ और संघर्ष की एक मर्मस्पर्शी कहानी
फिल्म की कहानी 'गंगा' नाम की एक शिक्षित और साहसी लड़की के इर्द-गिर्द बुनी गई है। गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म में सामाजिक बेड़ियों और इंसाफ की जंग को बखूबी दिखाया गया है। कहानी में मोड़ तब आता है जब शंकर (रवि किशन) गंगा की रक्षा करते हुए खुद अपंग हो जाता है। इसके बाद शुरू होता है रिश्तों, त्याग और समाज से लड़ने का वो सिलसिला, जिसने दर्शकों को अंत तक थियेटरों में बांधे रखा।