सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को उसकी अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटियों को घर से निकालने पर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने इसे अमानवीय बताते हुए कहा कि इस तरह के व्यवहार ने इंसान और पशु के बीच के बुनियादी अंतर को मिटा दिया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“आप किस तरह के व्यक्ति हैं, जो अपनी नाबालिग बेटियों की भी परवाह नहीं करते? उन्होंने इस दुनिया में आकर क्या गलत किया?”
पीठ ने आगे कहा:
“इनकी दिलचस्पी केवल संतान पैदा करने में थी। हम ऐसे क्रूर व्यक्ति को अपने न्यायालय में प्रवेश की अनुमति नहीं दे सकते। सारा दिन घर पर कभी सरस्वती पूजा तो कभी लक्ष्मी पूजा, और फिर यह सब।”
अदालत ने लगाई सख्त शर्तें
मामले से व्यथित सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक व्यक्ति अपनी बेटियों और पत्नी को निर्वाह भत्ता या कुछ कृषि भूमि नहीं देता, अदालत उसकी सुनवाई नहीं करेगी। बेंच ने उसके वकील से कहा:
“इस व्यक्ति से कहें कि वह अपनी बेटियों के नाम पर कृषि भूमि या सावधि जमा करे, या उन्हें भरण-पोषण की राशि दे। इसके बाद ही अदालत उसके पक्ष में कोई आदेश पारित करने पर विचार करेगी।”
अदालत ने यह भी कहा कि नाबालिग बेटियों की देखभाल न करना अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
दूसरी महिला से शादी और अन्य आरोप
झारखंड की निचली अदालत ने इस व्यक्ति को उसकी पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और परेशान करने का दोषी ठहराया था। इसके अलावा, उस पर धोखे से पत्नी का गर्भाशय निकलवाने और बाद में दूसरी महिला से शादी करने का भी आरोप है।
2015 में निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (विवाहित महिलाओं के साथ क्रूरता) के तहत दोषी ठहराते हुए 5,000 रुपये जुर्माने के साथ ढाई साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
मामले का घटनाक्रम
- यह मामला 2009 में दर्ज किया गया था।
- व्यक्ति ने 11 महीने हिरासत में बिताए।
- 24 सितंबर 2024 को झारखंड हाई कोर्ट ने उसकी सजा को घटाकर डेढ़ साल कर दिया और जुर्माना बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दिया।
पीड़िता और बेटियों की स्थिति
इस जोड़े की शादी 2003 में हुई थी, लेकिन पीड़िता केवल 4 महीने तक ससुराल में रह सकी। उसे 50,000 रुपये दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए पीड़िता और उसकी बेटियों के लिए न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए हैं।