सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के केस में आरोपी को जमानत देने के पटना हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए आत्मसमर्पण का आदेश दिया है। जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश को “हल्का और लापरवाही भरा” करार दिया।
गुरुवार को जारी आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जमानत देने के लिए आवश्यक कठोर शर्तों को पूरा नहीं किया गया था। यह मामला जनता दल यूनाइटेड (JDU) के विधान परिषद सदस्य (MLC) राधाचरण साह के बेटे कन्हैया प्रसाद से जुड़ा है। ईडी ने उन्हें अवैध बालू खनन मामले में गिरफ्तार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि आरोपी को एक हफ्ते के भीतर विशेष अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।
हाई कोर्ट ने दी थी जमानत, ईडी ने दी थी चुनौती
पिछले साल मई में पटना हाई कोर्ट ने कन्हैया प्रसाद को जमानत दी थी। उस फैसले में कहा गया था कि आरोपी को गवाहों के दबाव का सामना करना पड़ा है और PMLA के तहत कठोर शर्तों को पूरी तरह लागू करना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए जमानत दी थी।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि “जेल एक अपवाद है और जमानत नियम है।” इसी आधार पर आरोपी को जेल से रिहा कर दिया गया था। ईडी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर अब फैसला आया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को ठहराया गलत
जस्टिस बेला त्रिवेदी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पटना हाई कोर्ट ने PMLA की धारा 45 के कठोर प्रावधानों को नजरअंदाज करते हुए जमानत दी थी।
PMLA की धारा 45 के तहत जमानत देने से पहले कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होता है कि अभियोजन पक्ष (ईडी) को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाए और यह विश्वास हो कि आरोपी ने मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध नहीं किया है। लेकिन हाई कोर्ट के आदेश में इन जरूरी शर्तों का पालन नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में यह निष्कर्ष नहीं था कि आरोपी निर्दोष है। इसके अलावा, इस संभावना को भी नजरअंदाज किया गया कि वह जमानत पर रहते हुए दोबारा अपराध कर सकता है। इस कारण हाई कोर्ट का आदेश कानूनी रूप से गलत और असंगत माना गया।
मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में हालिया रुख
हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट ने कई मनी लॉन्ड्रिंग आरोपियों को जमानत दी है। इनमें लंबी न्यायिक प्रक्रिया, मुकदमे में देरी, प्रक्रियात्मक खामियां और अन्य मानकों के आधार पर राहत दी गई। हालांकि, इस मामले में कोर्ट ने साफ कर दिया कि PMLA के तहत कठोर मानकों को पूरा किए बिना जमानत नहीं दी जा सकती।