अजीबोगरीब जनजातियाँ: यहाँ की महिलाएं छोटे पुरुषों से करती हैं शादी, पति बन जाते हैं बंधुआ मजदूर

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बोंडा जनजाति भारत के 75 जनजातीय समूहों में से एक है और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में सफल रही है। बोंडा जनजाति के दो मुख्य समूह हैं: ऊपरी बोंडा और निचला बोंडा।  

उच्च और निम्न बोंडा जाति के बीच अंतर?

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ऊपरी बोंडा जनजाति बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग-थलग है और अपनी पारंपरिक जीवनशैली को बनाए रखती है। इसके विपरीत, निचली बोंडा जनजाति का बाहरी दुनिया से भले ही कम संपर्क हो, लेकिन ऊपरी बोंडा अभी भी अपने सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को मजबूती से बनाए हुए हैं।

भाषा और सांस्कृतिक विरासत?

 

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बोंडा लोग रेमो नामक एक ऑस्ट्रो-एशियाई बोली बोलते हैं, जो गुतोब भाषा के करीब है। यह भाषा उनके समुदाय की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा और उनकी पहचान का प्रतीक है। बोंडा जनजाति का जीवन उनकी पारंपरिक कृषि पद्धतियों पर निर्भर करता है, जिसमें वे झूम खेती की पद्धति का पालन करते हैं। इसके अलावा, पशुपालन और मौसमी वनोपज संग्रहण भी उनके जीवन को गति प्रदान करता है।  

पारंपरिक वस्त्र और आभूषणों का महत्व?

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बोंडा जनजाति के पुरुष जंजीर जैसी धोती (गोसी) पहनते हैं, जबकि महिलाएँ भारी धातु के हार और आभूषण पहनती हैं। पारंपरिक रूप से महिलाओं की पहचान उनके भारी, गोल आभूषणों (हारों) और कांसे व एल्युमीनियम के बेल्ट से होती है। इन आभूषणों और गहनों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।  

एक विशेष प्रकार की श्रम प्रणाली?

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बोंडा समुदाय में एक अनोखी श्रम प्रणाली है जिसे "गुफाम" या गोटी प्रणाली कहा जाता है। इस प्रणाली के तहत, एक महिला अपने पति के साथ बंधुआ मजदूर के रूप में रहती है। बोंडा समाज में मातृसत्ता का बोलबाला है, जहाँ महिलाएँ आमतौर पर अपने से 5 से 10 साल छोटे पुरुषों से विवाह करती हैं। इस परंपरा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं के पति बड़े होने पर उनके लिए काम कर सकें।

धार्मिक विश्वास और पूजा पद्धति?

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बोंडा लोग बहुदेववादी हैं और अनेक देवी-देवताओं और आत्माओं में विश्वास करते हैं। वे मुख्यतः प्रकृति के देवताओं की पूजा करते हैं और प्राकृतिक शक्तियाँ उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनकी पूजा पद्धति में विशेष रूप से प्राकृतिक शक्तियों जैसे जंगल, पहाड़, नदियाँ और सूर्य की पूजा की जाती है।

आदिवासी गांव कैसा होता है?

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बोंडा गाँव पारंपरिक रूप से स्वायत्त होते हैं। इन गाँवों में सामाजिक व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने के लिए पारंपरिक पदाधिकारी होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं "नायक" (गाँव का मुखिया), "चालान" (गाँव की बैठक का आयोजक) और "बारिक" (गाँव का संदेशवाहक)। ये सभी पदाधिकारी गाँव के निर्णय लेने और शांति-व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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