सुनील गावस्कर का आईसीसी और बीसीसीआई पर फूटा गुस्सा, खिलाड़ियों के बिजी शेड्यूल और घरेलू क्रिकेट पर दी कड़ी सलाह
भारतीय क्रिकेट इतिहास के पन्नों में जब भी महानतम और सबसे बेबाक बल्लेबाजों की बात आती है, तो पूर्व महान कप्तान सुनील गावस्कर का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। खेल की तकनीकी बारीकियों और खिलाड़ियों के हितों की रक्षा करने के मामले में गावस्कर कभी भी अपनी बात कहने से पीछे नहीं हटते हैं। इन दिनों भारतीय क्रिकेट जगत के गलियारों में खिलाड़ियों के लगातार व्यस्त रहने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू शेड्यूल को लेकर एक बहुत बड़ी बहस छिड़ गई है। इसी बीच, 'लिटिल मास्टर' के नाम से मशहूर सुनील गावस्कर ने इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) को आड़े हाथों लेते हुए एक तीखा और बेहद विचारणीय बयान दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि भारतीय क्रिकेटर्स कोई मशीन या गन्ना नहीं हैं, जिन्हें लगातार निचोड़कर उनके शरीर की ताकत की हर बूंद निकाल ली जाए। गावस्कर ने खिलाड़ियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा करने के साथ-साथ देश की पारंपरिक घरेलू क्रिकेट संरचना को बचाने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने की जोरदार मांग की है, जिससे क्रिकेट प्रशासन में खलबली मच गई है।
खिलाड़ियों का वर्कलोड और आईसीसी के फ्यूचर टूर प्रोग्राम पर गंभीर सवाल
सुनील गावस्कर ने प्रतिष्ठित पत्रिका 'स्पोर्टस्टार' में लिखे गए अपने एक कॉलम के जरिए आधुनिक क्रिकेट के व्यस्त कैलेंडर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया है कि आने वाले समय में जब आईसीसी (ICC) वर्ष 2027 से शुरू होने वाले अगले चार सालों के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कैलेंडर (Future Tours Programme) पर चर्चा करने के लिए बैठक करे, तो निर्णय लेने वाले अधिकारियों को इस बात का पूरा अहसास होना चाहिए कि खिलाड़ी इंसान हैं, रोबोट नहीं। लगातार नॉन-स्टॉप क्रिकेट खेलने की वजह से खिलाड़ियों के चोटिल होने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है, और उनके प्रदर्शन में भी गिरावट देखने को मिल रही है। गावस्कर का यह मानना है कि हालांकि भारत के पास दुनिया की सबसे मजबूत बेंच स्ट्रेंथ मौजूद है, और यह कहा जाता है कि भारत एक साथ तीन अलग-अलग टीमें उतार सकता है, लेकिन हालिया अंतरराष्ट्रीय नतीजों और मुकाबलों से यह साफ हो गया है कि एक समय में केवल एक ही भारतीय टीम से मैदान पर वर्चस्व कायम रखना और सभी ट्रॉफियां जीतना संभव नहीं हो पा रहा है। खिलाड़ियों को मानसिक और शारीरिक रूप से तरोताजा रखने के लिए उनके वर्कलोड को मैनेज करना अब किसी विकल्प की नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।
घरेलू क्रिकेट की उपेक्षा और रणजी ट्रॉफी के स्वरूप पर सुनील गावस्कर की चिंता
केवल अंतरराष्ट्रीय शेड्यूल पर ही नहीं, बल्कि भारतीय घरेलू क्रिकेट की वर्तमान स्थिति को लेकर भी सुनील गावस्कर ने बहुत तीखे सवाल उठाए हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि भारतीय राष्ट्रीय टीम का शानदार प्रदर्शन सीधे तौर पर हमारी मजबूत घरेलू क्रिकेट संरचना का परिणाम होता है। एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय टीम का निर्माण आसमान से नहीं होता, बल्कि इसके लिए देश की स्थानीय पिचों और घरेलू टूर्नामेंट्स का मजबूत होना सबसे जरूरी है। गावस्कर ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि पिछले कुछ वर्षों में हमारी पारंपरिक और सबसे प्रतिष्ठित रेड-बॉल चैंपियनशिप यानी रणजी ट्रॉफी को जिस तरह से नजरअंदाज किया गया है और उसके शेड्यूल को इधर-उधर धकेला गया है, उससे टेस्ट क्रिकेट की रीढ़ कमजोर हो रही है। उनका यह तर्क है कि लाल गेंद का क्रिकेट (Red Ball Cricket) खिलाड़ियों को वह मानसिक दृढ़ता, तकनीकी अनुशासन और धैर्य प्रदान करता है, जो सफेद गेंद (White Ball Cricket) का आधुनिक फॉर्मेट कभी नहीं सिखा सकता। यदि रेड-बॉल क्रिकेट की इसी तरह उपेक्षा होती रही, तो आने वाले समय में देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर के शीर्ष श्रेणी के टेस्ट बल्लेबाज और गेंदबाज मिलने बंद हो जाएंगे, जो भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा संकट साबित हो सकता है।
सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी और आईपीएल नीलामी के बीच बिगड़ता संतुलन
घरेलू टूर्नामेंट्स के शेड्यूलिंग में आ रही कमियों को उजागर करते हुए सुनील गावस्कर ने सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी (Syed Mushtaq Ali Trophy) और आईपीएल (IPL) की कार्यप्रणाली पर भी खुलकर बात की। उन्होंने सुझाव दिया कि जिस प्रकार रणजी ट्रॉफी के नॉकआउट मुकाबलों और लीग चरण के बीच योजना बनाई जाती है, उसी तर्ज पर अन्य घरेलू टूर्नामेंट्स को भी व्यवस्थित किया जाना चाहिए। वर्तमान स्थिति यह है कि रणजी ट्रॉफी के लीग चरण के बाद व्हाइट-बॉल टूर्नामेंट के लिए एक महीने से अधिक का लंबा अंतराल आ जाता है, जिससे खिलाड़ियों की लय, रिदम और मैच की गति पूरी तरह से बिगड़ जाती है। इसके अलावा, उन्होंने सवाल उठाया कि सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी को रणजी की तरह क्वार्टर फाइनल तक खेलकर बीच में कुछ हफ्तों का ब्रेक लेकर फिर से सेमीफाइनल और फाइनल क्यों नहीं आयोजित किया जाता? उन्होंने खुद ही इसका जवाब देते हुए लिखा कि ऐसा इसलिए नहीं किया जाता क्योंकि टूर्नामेंट के तुरंत बाद आईपीएल की मेगा या मिनी नीलामी (Auction) होनी होती है, और फ्रेंचाइजी तथा उनके स्काउट्स खिलाड़ियों पर नजर बनाए रखने के लिए इस टूर्नामेंट को अंत तक बिना किसी रुकावट के चलाना चाहते हैं। गावस्कर का मानना है कि सितंबर के शुरुआती महीनों में सीजन की शुरुआत में टूर्नामेंट आयोजित करने से उन स्काउट्स की पैनी नजरों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे महीनों बाद होने वाली नीलामी में भी खिलाड़ियों के प्रदर्शन को नहीं भूलते हैं।
विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनाने के लिए घरेलू ढांचे को मजबूत करना अनिवार्य
अपने इस लेख के अंत में सुनील गावस्कर ने भारतीय क्रिकेट प्रशासकों को यह चेताया है कि यदि भारतीय क्रिकेट को वैश्विक पटल पर अपना दबदबा हमेशा के लिए बनाए रखना है, तो उसे अपनी जड़ों यानी घरेलू क्रिकेट की तरफ लौटना ही होगा। एशियाई खेलों जैसे आयोजनों में स्वर्ण पदक जीतने से खिलाड़ियों को भले ही क्षणिक ऊर्जा और आत्मविश्वास मिलता हो, लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए केवल टी-20 या वनडे लीग काफी नहीं हैं। जब तक रणजी ट्रॉफी और अन्य लाल गेंद के घरेलू टूर्नामेंट्स को उनका खोया हुआ सम्मान और कैलेंडर में प्रमुख स्थान वापस नहीं दिया जाता, तब तक भारत के लिए विश्व स्तरीय और तकनीकी रूप से परिपक्व खिलाड़ी तैयार करना मुमकिन नहीं होगा। गावस्कर की यह दो टूक सलाह एक ऐसी घंटी है जिसे बीसीसीआई और आईसीसी दोनों को ही समय रहते सुन लेना चाहिए, अन्यथा खिलाड़ियों का अत्यधिक शारीरिक और मानसिक शोषण भारतीय क्रिकेट की उस नींव को हिला कर रख देगा जिसे दशकों की मेहनत से सींचा गया है। खिलाड़ियों के स्वास्थ्य की सुरक्षा और घरेलू क्रिकेट की गरिमा का यह मुद्दा अब केवल एक पूर्व कप्तान की राय नहीं, बल्कि भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।