Special on Engineers Day : सड़कें और पुल तो बना देते हैं, पर झारखंड के इन विश्वकर्माओं की राह कांटों भरी क्यों है?

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News India Live, Digital Desk: Special on Engineers Day : आज इंजीनियर्स डे है। यह दिन उन लोगों को सलाम करने का है जो अपनी सोच, अपनी मेहनत और अपने हुनर से एक राज्य और देश का भविष्य गढ़ते हैं। जब हम झारखंड की चौड़ी सड़कें, ऊंचे पुल और बड़ी-बड़ी इमारतें देखते हैं, तो हम तरक्की को देखते हैं। लेकिन हम अक्सर उन चेहरों को भूल जाते हैं जिनके पसीने और दिन-रात की मेहनत से यह तरक्की हकीकत में बदलती है - और वो हैं हमारे इंजीनियर्स।

झारखंड जैसे राज्य में, जहां विकास की अपार संभावनाएं हैं, वहां एक इंजीनियर की भूमिका किसी 'विश्वकर्मा' से कम नहीं है। लेकिन सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर हमें दिखाई नहीं देता। यहां एक इंजीनियर के लिए काम करना किसी जंग लड़ने से कम नहीं होता।

किन चुनौतियों से हर दिन जूझते हैं झारखंड के इंजीनियर?

  1. जमीन का जंजाल: झारखंड में किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती जमीन अधिग्रहण की होती है। कोई भी प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही जमीन के विवादों में ऐसा फंसता है कि उसे पूरा होने में सालों लग जाते हैं। इंजीनियर्स के लिए यह सबसे बड़ा सिरदर्द होता है।
  2. 'लाल आतंक' का साया: राज्य के कई जिले आज भी नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहे हैं। इन इलाकों में सड़क या पुल बनाना जान हथेली पर रखकर काम करने जैसा होता है। इंजीनियर्स और मजदूरों को अक्सर नक्सलियों की तरफ से धमकी, लेवी (रंगदारी) और यहां तक कि अपहरण का भी सामना करना पड़ता है।
  3. राजनीतिक और स्थानीय दबाव: सरकारी प्रोजेक्ट्स में अक्सर राजनीतिक दखलअंदाजी बहुत ज्यादा होती है। इसके अलावा, कई बार स्थानीय दबंग और असामाजिक तत्व भी काम में रुकावट डालते हैं और अपने फायदे के लिए इंजीनियर्स पर दबाव बनाते हैं।
  4. संसाधनों की कमी: कई बार प्रोजेक्ट के लिए समय पर फंड नहीं मिल पाता या जरूरी मशीनरी और संसाधनों की कमी होती है, जिससे काम की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और इसका सारा दबाव इंजीनियर पर ही आता है।

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद, झारखंड के इंजीनियर हर दिन एक नई हिम्मत के साथ अपने काम में जुटे रहते हैं। उनका सिर्फ एक ही सपना होता है - एक ऐसा झारखंड बनाना जहां हर गांव पक्की सड़क से जुड़े, हर नदी पर पुल हो और विकास की रोशनी कोने-कोने तक पहुंचे। आज के दिन, हमें सिर्फ उनके बनाए गए ढांचों को ही नहीं, बल्कि उनके इस जज्बे को भी सलाम करना चाहिए।