पितरों को याद करने का दिन: सर्वपितृ अमावस्या की कहानी जो हमें बहुत कुछ सिखाती है
Sarv Pitru Amavasya Katha in Hindi: हम सभी की ज़िंदगी में हमारे बड़े-बुज़ुर्गों का बहुत बड़ा हाथ होता है. वे जब तक साथ रहते हैं, हमें उनकी छत्रछाया मिलती है, और जब वे चले जाते हैं, तो उनकी यादें और आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहते हैं. पितृ पक्ष साल का वही समय होता है, जब हम अपने उन्हीं पूर्वजों को याद करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं और उनका शुक्रिया अदा करते हैं.
सर्वपितृ अमावस्या इसी पितृ पक्ष का आख़िरी और सबसे ज़रूरी दिन माना जाता है. कहते हैं कि इस दिन हमारे पितर यानी पूर्वज हमसे विदा लेकर वापस अपने लोक लौट जाते हैं. इस दिन से जुड़ी एक बहुत ही पुरानी कहानी है, जो हमें इस दिन की अहमियत के बारे में बताती है.
एक कहानी जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है
बहुत समय पहले की बात है, अग्निष्वात और बर्हिषपद नाम के दो पितृ देव थे. उनकी एक बेटी थी, जिसका नाम अक्षोदा था. अक्षोदा अपने पितरों से बहुत प्यार करती थी और उन्हें खुश करने के लिए हमेशा कुछ न कुछ करती रहती थी. एक बार उसने आश्विन महीने की अमावस्या के दिन अपने पितरों के लिए तपस्या शुरू की.
उसकी तपस्या से खुश होकर सभी पितृ देव उसे वरदान देने के लिए प्रकट हुए. लेकिन उन सभी में एक पितृ थे जिनका नाम अमावसु था. वे बहुत तेजस्वी थे और अक्षोदा उन्हें देखकर उनकी ओर आकर्षित हो गई. जब पितरों ने अक्षोदा से वरदान मांगने को कहा, तो उसने अमावसु का साथ मांग लिया.
यह सुनकर सभी पितर बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने गुस्से में अक्षोदा को श्राप दे दिया कि उसे पितृ लोक छोड़कर धरती पर जाना होगा. श्राप मिलते ही अक्षोदा को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह रोते हुए माफ़ी मांगने लगी.
तब पितरों को उस पर दया आ गई. उन्होंने कहा कि अगले जन्म में तुम एक मछली की बेटी के रूप में जन्म लोगी. वहां तुम्हारी मुलाक़ात महर्षि पाराशर से होगी और तुम्हारे गर्भ से भगवान वेद व्यास का जन्म होगा. इसके बाद तुम श्राप से मुक्त होकर वापस हमारे पास लौट आओगी.
अमावसु का सम्मान और इस दिन का नामकरण
दूसरी तरफ, सभी पितर अमावसु से बहुत खुश थे. उन्होंने अमावसु की तारीफ़ करते हुए कहा कि एक स्त्री के सौंदर्य को देखकर भी उनका मन नहीं डिगा, यह बहुत बड़ी बात है. उनके इसी संयम और स्थिरता के सम्मान में पितरों ने उस दिन को 'अमावसु' का नाम दिया, जो बाद में अमावस्या कहलाया. यही वजह है कि इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या के नाम से जाना जाता है और इसका इतना ज़्यादा महत्व है.
यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारे पूर्वजों का सम्मान करना कितना ज़रूरी है और एक छोटी-सी भूल भी कितनी भारी पड़ सकती है.