सावन का आखिरी शनिवार: शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से मिलेगी तुरंत राहत, शाम ढलने से पहले कर लें ये 3 चमत्कारी उपाय
पवित्र सावन मास का अंतिम चरण चल रहा है और इस दौरान पड़ने वाला सावन का आखिरी शनिवार धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी माना जाता है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव न्याय के देवता शनिदेव के परम गुरु हैं। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि शनिदेव ने अपने पिता सूर्यदेव के तेज से अलग होकर भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या की थी, जिसके बाद महादेव ने उन्हें नवग्रहों में दंडाधिकारी और कर्मफल दाता का सर्वोच्च स्थान प्रदान किया था। यही कारण है कि जब सावन के पवित्र महीने में शनिवार का दिन पड़ता है, तो उस दिन की गई पूजा-अर्चना से महादेव और शनिदेव दोनों एक साथ प्रसन्न होते हैं। यदि आपकी कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, महादशा या अंतर्दशा के कारण मानसिक तनाव, कार्यों में अड़चन, आर्थिक तंगी या शारीरिक बीमारियां बनी हुई हैं, तो सावन का अंतिम शनिवार इन सभी पीड़ाओं से मुक्ति पाने का सबसे सिद्ध अवसर माना जाता है।
सावन और शनिवार का दुर्लभ संयोग: महादेव की आराधना से क्यों शांत होते हैं शनिदेव?
वैदिक ज्योतिष में शनि को सबसे मंद गति से चलने वाला और सबसे प्रभावशाली ग्रह माना गया है। शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर शुभ और अशुभ फल प्रदान करते हैं। जब किसी जातक पर शनि की साढ़ेसाती (साढ़े सात वर्ष की अवधि) या ढैय्या (ढाई वर्ष की अवधि) का प्रभाव होता है, तो उसे जीवन के कई मोर्चों पर कड़े इम्तिहानों से गुजरना पड़ता है। हालांकि, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनिदेव कभी भी भगवान शिव के सच्चे भक्तों को अकारण कष्ट नहीं पहुंचाते। सावन के महीने में जब चारों तरफ शिव भक्ति की धारा बह रही होती है, उस समय शनिदेव की आराधना करने से उनकी क्रूर दृष्टि शांत हो जाती है और वे साधक पर अपनी सौम्य कृपा बरसाते हैं। सावन के आखिरी शनिवार को किए गए विशेष अनुष्ठान पूरे वर्ष भर के शनि दोषों के नकारात्मक प्रभाव को कम करने की शक्ति रखते हैं।
साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों से मुक्ति के लिए सावन के आखिरी शनिवार करें ये 3 अचूक उपाय
यदि आप शनिदेव के प्रकोप या जीवन की निरंतर समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो सावन के अंतिम शनिवार को श्रद्धा और नियम के साथ ये तीन कार्य अवश्य करें:
1. शिवलिंग पर काले तिल, कच्चा दूध और शमी पत्र अर्पित कर करें रुद्राभिषेक
शनि दोष की शांति के लिए सबसे पहला और सर्वोपरि उपाय देवों के देव महादेव की शरण में जाना है। सावन के आखिरी शनिवार की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पास के शिवालय में जाकर तांबे या कांसे के लोटे के बजाय पीतल या चांदी के पात्र में शुद्ध गंगाजल, कच्चा गाय का दूध और काले तिल मिलाएं। उत्तर दिशा की ओर मुख करके शिवलिंग पर यह जल 'ॐ नमः शिवाय' और शनि मंत्र 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' का जप करते हुए धीरे-धीरे अर्पित करें। इसके बाद शिवलिंग पर कम से कम 11 या 21 शमी के पत्ते और बेलपत्र चढ़ाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शमी का वृक्ष शनिदेव को अत्यंत प्रिय है और जब शमी पत्र भगवान शिव को समर्पित किया जाता है, तो शनिदेव तत्काल प्रसन्न होकर जातक की कुंडली से साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टकारी प्रभाव को समाप्त कर देते हैं।
2. सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का चौमुखी दीपक और परिक्रमा
दूसरा चमत्कारी उपाय शनिवार की शाम यानी प्रदोष काल में किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में पीपल के वृक्ष को देववृक्ष माना गया है और शनिवार के दिन पीपल में भगवान विष्णु और शनिदेव का साक्षात वास होता है। सावन के आखिरी शनिवार को शाम के समय किसी पुराने और स्वस्थ पीपल के पेड़ के पास जाएं। मिट्टी के दीपक में शुद्ध सरसों का तेल भरें और उसमें दो साबुत लौंग व कुछ दाने काले तिल डालें। इस चौमुखी दीपक को पीपल की जड़ के पास प्रज्वलित करें। दीपक जलाने के बाद पीपल के पेड़ की सात बार क्लॉकवाइज (घड़ी की सुई की दिशा में) परिक्रमा करें और प्रत्येक परिक्रमा के साथ मन ही मन 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' अथवा शनि चालीसा का पाठ करें। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद दोनों हाथ जोड़कर शनिदेव और पितृदेवों से अपने जाने-अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। यह उपाय कुंडली के बड़े से बड़े पितृ दोष और शनि दोष को दूर करने में अचूक माना जाता है।
3. कांसे की कटोरी में 'छाया दान' और जरूरतमंदों को काले अन्न-वस्त्र का वितरण
तीसरा सबसे शक्तिशाली उपाय 'छाया दान' है, जिसे शनि के अनिष्ट प्रभावों को नष्ट करने के लिए सर्वोत्तम माना गया है। सावन के आखिरी शनिवार को एक कांसे, लोहे या मिट्टी की कटोरी में शुद्ध सरसों का तेल लें। उस तेल में एक सिक्का डालें और उसमें अपना चेहरा स्पष्ट रूप से देखें (अपनी परछाई निहारें)। चेहरा देखने के बाद उस तेल को किसी शनि मंदिर में 'छाया दान' के रूप में समर्पित कर दें या तेल मांगने वाले डाकोत को दान कर दें। इसके अतिरिक्त, इस दिन किसी निर्धन, असहाय या दिव्यांग व्यक्ति को भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार काली उड़द की दाल, काला छाता, चमड़े के जूते-चप्पल या काले कंबल का दान करें। शनिदेव कर्म और सेवा के कारक हैं, इसलिए जब आप समाज के वंचित वर्ग की सहायता करते हैं, तो शनिदेव अत्यंत प्रसन्न होकर आपकी कुंडली के दुर्योगों को राजयोग में बदलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
किन राशियों पर है इस समय साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, वर्तमान में कुंभ, मकर और मीन राशि के जातकों पर शनि की साढ़ेसाती का विभिन्न चरण चल रहा है, जबकि कर्क और वृश्चिक राशि के जातक शनि की ढैय्या के प्रभाव क्षेत्र में हैं। इन पांचों राशियों के जातकों को सावन के इस अंतिम शनिवार को विशेष रूप से सचेत रहकर पूजा-अर्चना और दान-पुण्य करना चाहिए। इसके अलावा जिन जातकों की कुंडली में शनि नीच राशि (मेष) में स्थित हैं या सूर्य, मंगल और राहु के साथ युति बनाकर बैठे हैं, उन्हें भी यह उपाय करने से मानसिक शांति, कार्यक्षेत्र में पदोन्नति और स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होगी।
पूजा और दान के दौरान इन जरूरी नियमों व सावधानियों का रखें ध्यान
शनिदेव की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। शनिवार के दिन पूजा करते समय कभी भी शनिदेव की प्रतिमा की आंखों में सीधे आंखें डालकर नहीं देखना चाहिए; हमेशा उनकी दृष्टि से बचते हुए उनके चरणों की ओर देखकर ही प्रार्थना करें। इस पूरे दिन तामसिक भोजन, मांसाहार और शराब का पूरी तरह त्याग करें। किसी भी बुजुर्ग, महिला, सफाईकर्मी, मजदूर या असहाय व्यक्ति का अपमान न करें और न ही किसी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार करें। शनिवार के दिन लोहा, सरसों का तेल, चमड़ा या नमक खरीदकर घर लाने से बचें, बल्कि इन वस्तुओं का दान करने का संकल्प लें।