करवाचौथ पर नथ से चंद्रमा को क्यों दिया जाता है अर्घ्‍य, अखंड सौभाग्य से जुड़ी इस बेहद अनोखी और प्राचीन परंपरा का रहस्य

करवाचौथ पर नथ से चंद्रमा को क्यों दिया जाता है अर्घ्‍य, अखंड सौभाग्य से जुड़ी इस बेहद अनोखी और प्राचीन परंपरा का रहस्य

सनातन संस्कृति और हमारे देश के पारंपरिक पर्वों में 'करवा चौथ' (Karwa Chauth) के व्रत का स्थान सबसे खास और पवित्र माना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए उनके अटूट प्रेम, समर्पण और वैवाहिक जीवन की लंबी उम्र का सबसे बड़ा उत्सव होता है। इस दिन सुबह से लेकर रात तक भूखे-प्यासे रहकर माता करवा और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, और फिर शाम को आसमान में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद अर्घ्य देकर यह व्रत खोला जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों में करवा चौथ मनाने के अपने-अपने अनूठे और सुंदर रीति-रिवाज हैं। इनमें उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख इलाकों जैसे कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ हरियाणा और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में एक बहुत ही खास और दिलचस्प परंपरा निभाई जाती है, जहां महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देते समय अपनी 'नथ' (Nath) का इस्तेमाल करती हैं। आखिर सुहागिन महिलाओं द्वारा नथ से चंद्रमा को अर्घ्य देने की इस अनूठी परंपरा के पीछे क्या धार्मिक रहस्य और लोक मान्यताएं जुड़ी हैं? आइए विस्तार से जानते हैं इस परंपरा के हर एक पहलू को।

क्या है करवा चौथ पर नथ से जल गिराकर चंद्रमा को अर्घ्य देने की अनोखी परंपरा?

करवा चौथ के दिन जब शाम ढलती है और सुहागिनें सोलह श्रृंगार करके छलनी से चांद का दीदार करती हैं, उसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने की मुख्य रस्म शुरू होती है। सामान्य तौर पर लोग लोटे या मिट्टी के करवे से सीधे चंद्रमा को जल अर्पित करते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज और आसपास के कई इलाकों में इस रस्म को निभाने का तरीका बेहद अलग और पारंपरिक होता है।

इस परंपरा के तहत महिलाएं जब करवे से जल गिराती हैं, तो जल की उस धार को अपनी नाक में पहनी जाने वाली 'नथ' से स्पर्श कराते हुए या उसके पास से नीचे गिराती हैं। कुछ जगहों पर करवे में लगी हुई एक-एक सींक को अपनी नथ पर लगाते हुए चंद्रमा को जल अर्पित किया जाता है। इस दौरान महिलाओं के चेहरे पर एक अलग ही तेज और पति की लंबी उम्र की दुआएं होती हैं। अर्घ्य देते समय महिलाएं पारंपरिक और लोक गीत या छोटी-छोटी पंक्तियां भी बोलती हैं, जैसे— "अर्घ्य लूं चंद्रमा तेरा, सुहाग अमर रहे मेरा" या फिर "चंदा का दियाना, चंदनिया की रात, चंद्रमा का अर्घ्‍य, मेरे पिया का व्रत". क्षेत्रीय बोलियों के अनुसार इन पंक्तियों के रूपों में थोड़ा अंतर जरूर हो सकता है, लेकिन इनकी भावनाएं हमेशा एक जैसी यानी पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की होती हैं।

सुहाग और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है महिलाओं का सोलह श्रृंगार और नथ

भारतीय लोक संस्कृति और वैवाहिक मान्यताओं में 'नथ' को सिर्फ एक साधारण आभूषण नहीं माना गया है, बल्कि इसे सुहागिन महिलाओं के सोलह श्रृंगार का सबसे प्रमुख और पवित्र हिस्सा माना जाता है। विवाह के समय से लेकर जीवनभर के तमाम मांगलिक उत्सवों में नथ को सौभाग्य, सुहाग और स्त्री के वैवाहिक सम्मान से जोड़कर देखा जाता है।

करवा चौथ के पावन अवसर पर जब महिलाएं नथ पहनकर चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, तो इसका सीधा साध्यात्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ यह होता है कि वे अपने सुहाग के सबसे बड़े प्रतीक को इस पावन पूजा में शामिल कर रही हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार, नथ के पास से जल की धार गिराना इस बात का प्रतीक है कि पत्नी अपने जीवनसाथी यानी पति के प्रति अपने अगाध प्रेम, समर्पण और अटूट रिश्ते को अमर रखना चाहती है। चंद्रमा को शीतलता, प्रेम और मन का कारक माना गया है, इसलिए जब सुहाग के प्रतीक यानी नथ के माध्यम से चंद्रमा को जल अर्पित किया जाता है, तो यह वैवाहिक रिश्ते को और अधिक मजबूत और प्रगाढ़ बनाता है।

पवित्रता, सकारात्मकता और नजर दोष से बचाव से जुड़ी है यह मान्यता

इस प्राचीन रस्म के पीछे कई गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्वास भी जुड़े हुए हैं। हमारे समाज में सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि जब कोई स्त्री सोलह श्रृंगार करके बेहद सुंदर दिखती है, तो उसे या उसके सुहाग को किसी की बुरी नजर (Nazar Dosh) लग सकती है। करवा चौथ के दिन महिलाएं सबसे सुंदर और पारंपरिक परिधानों में सजती-संवरती हैं, ऐसे में लोक परंपराओं के अनुसार नजर दोष से बचाव के लिए कई उपाय किए जाते हैं।

नथ से जल गिराने की इस परंपरा को लेकर बुजुर्ग महिलाओं का यह भी मानना है कि सुहाग के प्रतीक नथ का स्पर्श पाकर अर्घ्य की यह पूरी रस्म और भी अधिक पवित्र और शक्तिशाली हो जाती है। जल को सनातन धर्म में शुद्धता, ऊर्जा और जीवन का प्रतीक माना गया है। जब जल नथ को छूकर चंद्रमा की ओर प्रवाहित होता है, तो यह नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर भगाता है और घर-परिवार में सकारात्मकता का संचार करता है। इससे न केवल नजर दोष दूर होता है, बल्कि ऐसी अटूट लोकमान्यता है कि इससे पति-पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मांतर के लिए सुरक्षित और सुखी हो जाता है।

संस्कृति और परंपराओं की सतरंगी छटा पेश करते हैं ऐसे पर्व

उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही ऐसी परंपराएं इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं हैं, बल्कि वे समाज को जोड़ने, रिश्तों में मिठास घोलने और लोक संस्कृति को जिंदा रखने का बहुत बड़ा माध्यम हैं। कानपुर, लखनऊ और प्रयागराज जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहरों में आज भी इन छोटी-छोटी रस्मों को उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाया जाता है, जितना सदियों पहले निभाया जाता था। करवा चौथ की रात जब आसमान में चांद निकलता है और महिलाएं नथ से जल गिराकर अपने सुहाग की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं, तो वह दृश्य वाकई में भारतीय संस्कृति की खूबसूरती और उसकी गहराई का सबसे अनूठा उदाहरण बन जाता है।