रावण वध से पहले भगवान श्रीराम ने क्यों की थी देवी अपराजिता की पूजा, दशहरे से जुड़ा यह बेहद खास और रहस्यमयी प्रसंग

रावण वध से पहले भगवान श्रीराम ने क्यों की थी देवी अपराजिता की पूजा, दशहरे से जुड़ा यह बेहद खास और रहस्यमयी प्रसंग

सनातन हिंदू संस्कृति में उत्सवों और पर्वों की एक बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें हर एक त्योहार के पीछे कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक संदेश छुपा होता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला दशहरा (Dussehra) या विजयदशमी (Vijayadashami) का पर्व मुख्य रूप से अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की भव्य जीत का प्रतीक माना जाता है। इस पावन दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका के अहंकारी राजा रावण का वध करके पूरी सृष्टि को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। यही कारण है कि हर साल इस दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं और उत्सव मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण जैसी अजेय और महाशक्तिशाली असुर ताकत का संहार करने से पहले भगवान श्रीराम ने युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए किस विशेष देवी की आराधना की थी? आइए रामायण और पुराणों से जुड़े इस अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक प्रसंग के बारे में विस्तार से जानते हैं।

क्या है 'अपराजिता' शब्द का अर्थ और इसका पौराणिक महत्व

सनातन ग्रंथों के अनुसार, जब भी जीवन में किसी बड़ी चुनौती का सामना करना हो या किसी कठिन युद्ध में उतरना हो, तो दैवीय कृपा प्राप्त करना आवश्यक माना गया है। रावण वध के इस प्रसंग में 'अपराजिता' शब्द का जिक्र आता है। संस्कृत व्याकरण और धार्मिक संदर्भों में 'अपराजिता' का शाब्दिक अर्थ होता है— 'वह शक्ति या ऊर्जा जिसे कभी भी पराजित न किया जा सके' यानी अजेय।

पौराणिक कथाओं और वाल्मीकि रामायण तथा वराह पुराण के विभिन्न प्रसंगों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण के पास असीम शक्तियां थीं और उसे वरदान प्राप्त था कि उसका वध करना साधारण रूप से संभव नहीं था। ऐसे में, लंका पर अंतिम और निर्णायक आक्रमण करने से पहले भगवान श्रीराम ने अपनी सेना की सफलता और अधर्म के नाश के लिए देवी अपराजिता की विशेष पूजा-अर्चना की थी।

भगवान श्रीराम ने क्यों की थी मां अपराजिता की आराधना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण के साथ महासंग्राम में उतरने से पूर्व विजय का आशीर्वाद पाने के लिए मां अपराजिता का आह्वान किया था। प्रभु श्रीराम यह भली-भांति जानते थे कि युद्ध में जीत केवल शस्त्रों के बल पर नहीं, बल्कि दैवीय आशीर्वाद और नैतिक बल से ही सुनिश्चित होती है।

शास्त्रों में देवी अपराजिता को मां दुर्गा या मां वैष्णवी का ही एक अत्यंत तेजस्वी स्वरूप माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जो भी जातक विजयदशमी के दिन सच्चे मन से देवी अपराजिता की पूजा करता है, उसे जीवन के हर क्षेत्र में दुश्मनों और बाधाओं पर विजय प्राप्त होती है। प्रभु श्रीराम द्वारा की गई इस पूजा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि धर्म की इस लड़ाई में सत्य की ही जीत हो और देवताओं का कल्याण हो सके।

दशहरा के दिन कैसे की जाती है देवी अपराजिता की पूजा

सनातन परंपरा में विजयदशमी के दिन मां अपराजिता की पूजा-अर्चना के लिए एक निश्चित और बेहद शुभ समय निर्धारित किया गया है। धार्मिक विधान के अनुसार, यह पूजा मुख्य रूप से अपराह्न काल (दोपहर के समय) करना सबसे अधिक फलदायी माना जाता है। शत्रुओं पर विजय और कार्यों में सफलता पाने के लिए इस दिन निम्नलिखित विधि से पूजन करना चाहिए:

  • स्नान और शुद्धि: दशहरे के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और सूर्य देव को जल अर्पित करें।

  • दिशा और आसन: पूजा के समय उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) की ओर मुख करके आसन पर बैठें।

  • प्रतिमा स्थापना: एक साफ और पवित्र चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर देवी अपराजिता की मूर्ति या तस्वीर को विराजमान करें।

  • पूजन सामग्री: माता को रोली, अक्षत (चावल), सुगंधित फूल और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।

  • आरती और भोग: देसी घी का दीपक जलाकर विधि-विधान से आरती करें और मिष्ठान या फल का भोग लगाएं। अंत में सभी में प्रसाद वितरित करें।

दशहरे का यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि कितनी भी बड़ी चुनौती क्यों न हो, यदि आपके इरादे नेक हैं और आपको अपनी संस्कृति व संस्कारों काबल है, तो ईश्वर की कृपा से विजय निश्चित रूप से प्राप्त होती है।