लंका विजय के बाद संगम तट पर क्यों लेटे थे हनुमान जी, जानिए प्रयागराज के इस दुनिया के इकलौते लेटे हुए हनुमान मंदिर का रहस्य
सनातन संस्कृति और पौराणिक आस्था के केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाले पावन तीर्थराज प्रयागराज की धरती रहस्यों, चमत्कारों और अध्यात्म का एक ऐसा अद्भुत संगम है, जहां हर एक कोने से कोई न कोई प्राचीन कथा जुड़ी हुई है। संगम के पवित्र तटों पर बसे इस शहर में आस्था का एक ऐसा केंद्र मौजूद है जो दुनिया भर में अपनी अनूठी बनावट और पौराणिक महत्व के कारण अद्वितीय माना जाता है। हम बात कर रहे हैं प्रयागराज के ऐतिहासिक दारागंज मोहल्ले में स्थित उस प्रसिद्ध और भव्य मंदिर की, जहां बजरंगबली अपनी सामान्य खड़ी मुद्रा में नहीं, बल्कि जमीन पर लेटी हुई मुद्रा में विराजमान हैं। 'लेटे हुए हनुमान जी' के नाम से दुनिया भर में विख्यात यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह त्रेतायुग की उन महागाथाओं का जीवंत प्रमाण है जिन्हें सुनकर आज भी भक्तों की आंखें श्रद्धा से नम हो जाती हैं। लंका दहन और लंका विजय के पश्चात बजरंगबली की थकान मिटाने के लिए संगम तट पर विश्राम करने की यह पौराणिक कथा इस स्थान को अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमयी बनाती है।
तीर्थराज प्रयागराज के दारागंज में स्थित है 600 से 700 साल पुराना यह ऐतिहासिक और दिव्य लेटे हुए हनुमान मंदिर
हिंदू धर्म शास्त्रों और वेदों में प्रयागराज को 'तीर्थराज' यानी सभी तीर्थों का राजा होने का गौरव प्राप्त है। इसी पवित्र नगरी में गंगा और यमुना के पावन मिलन स्थल के समीप स्थित लेटे हुए हनुमान जी का मंदिर इस तीर्थ की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण पहचान माना जाता है। इस प्राचीन मंदिर के इतिहास और स्थापना को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनके अनुसार इस दिव्य मूर्ति की स्थापना संत समर्थ गुरु रामदास जी द्वारा की गई थी। मंदिर के परिसर में प्रवेश करते ही एक अलग ही प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शांति का अहसास होने लगता है। इस भव्य मंदिर परिसर में केवल बजरंगबली की ही मूर्ति नहीं है, बल्कि उनके साथ-साथ भगवान शिव, माता पार्वती, प्रथम पूज्य गणेश जी, काल भैरव, मां दुर्गा, मां काली और नवग्रहों की सुंदर और भव्य मूर्तियां भी स्थापित हैं। यहां आने वाले हर एक श्रद्धालु को एक ही स्थान पर इन सभी देवी-देवताओं के दर्शन और पूजन का सौभाग्य प्राप्त होता है, जिससे इस तीर्थ स्थल का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
लगभग 20 फीट लंबी है हनुमान जी की दक्षिणाभिमुखी प्रतिमा, दाएं पैर के नीचे दबा है पापी अहिरावण
प्रयागराज के इस प्रसिद्ध मंदिर में विराजमान हनुमान जी की प्रतिमा अपने आप में बेहद खास और अद्धभुत है। मान्यताओं के मुताबिक हनुमान जी की यह लेटी हुई मूर्ति दक्षिणाभिमुखी है और इसकी कुल लंबाई लगभग 20 फीट है। यह प्रतिमा धरातल से करीब 6 से 7 फीट नीचे गर्भगृह में स्थित है, जिसके दर्शन करने के लिए भक्तों को सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है। स्थानीय लोग और श्रद्धालु इन्हें बड़े हनुमानजी, किले वाले हनुमानजी, लेटे हुए हनुमानजी और बांध वाले हनुमान जी जैसे तमाम नामों से पुकारते हैं। इस पवित्र प्रतिमा के धार्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए विद्वान बताते हैं कि इनके बाएं पैर के नीचे कामदा देवी और दाएं पैर के नीचे पाताल लोक का स्वामी और राम भक्तों का शत्रु अहिरावण दबा हुआ है। इसके साथ ही उनकी प्रतिमा के दाएं हाथ में मर्यादा पुरुषोत्तम राम और माता सीता के छोटे स्वरूप तथा बाएं हाथ में उनकी पारंपरिक गदा सुशोभित है। यहां आने वाले तमाम भक्तों का ऐसा अटूट विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से इन चरणों में अपनी अर्जी लगाता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।
त्रेतायुग की पौराणिक कथा: लंका विजय के बाद थकान मिटाने के लिए संगम तट पर क्यों लेटे थे संकटमोचन
इस मंदिर से जुड़ी सबसे लोकप्रिय और प्राचीन पौराणिक कथा रामायण काल से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त कर ली और रावण तथा उसके पूरे राक्षस साम्राज्य का अंत कर दिया, तब लंका से अयोध्या लौटते समय रास्ते में महाबली हनुमान जी को अत्यधिक थकान महसूस होने लगी। युद्ध के दौरान उन्होंने जिस असीम पराक्रम और ऊर्जा का प्रदर्शन किया था, उसके बाद उनके शरीर की थकान को दूर करना आवश्यक था। तब माता सीता के कहने और उनकी इच्छा के अनुसार, हनुमान जी ने विश्राम करने के लिए प्रयाग की इस पावन धरती को चुना और वे संगम के इसी पवित्र तट पर आराम करने के लिए लेट गए। माता सीता के स्नेह और आशीर्वाद से उनकी सारी थकान दूर हो गई और वे यहीं विश्राम की मुद्रा मेंलीन हो गए। इसी पौराणिक प्रसंग को आधार मानते हुए सदियों बाद यहां लेटे हुए हनुमान जी का यह भव्य मंदिर स्थापित किया गया, जो आज कम से कम 600 से 700 साल पुराना माना जाता है।
साल में एक बार मां गंगा खुद चलकर आती हैं अपने अनन्य भक्त हनुमान जी को स्नान कराने के लिए
इस मंदिर से जुड़ा एक ऐसा रहस्य और चमत्कार भी है जो विज्ञान और आस्था के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब हनुमान जी लंका विजय के बाद रामजी की सेवा पूरी करके प्रयागराज के संगम तट पर लेटे थे, तब से लेकर आज तक यह स्थान अत्यंत पवित्र और जागृत माना जाता है। हर साल मानसून के मौसम में जब उत्तर भारत में भारी बारिश होती है और नदियां उफान पर होती हैं, तब मां गंगा का जलस्तर इतना बढ़ जाता है कि बाढ़ का पानी सीधे इस मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर जाता है और लेटे हुए हनुमान जी की पूरी प्रतिमा को अपने आंचल में डुबो लेता है। धार्मिक मत के अनुसार इसे कोई सामान्य आपदा नहीं माना जाता, बल्कि इसे इस बात का प्रतीक माना जाता है कि मां गंगा वर्ष में एक बार स्वयं अपने अनन्य भक्त हनुमान जी का अभिषेक करने और उन्हें स्नान कराने के लिए यहां आती हैं। इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्राकृतिक कारणों से हर साल मंदिर में प्रवेश करता है बाढ़ का पानी
जहां एक ओर इस घटना को पूरी तरह से धार्मिक और चमत्कारी माना जाता है, वहीं अगर वैज्ञानिक नजरिए से इस पर विचार किया जाए तो इसके पीछे भौगोलिक और प्राकृतिक कारण छिपे हैं। प्रयागराज तीन नदियों—गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के मिलन स्थल पर स्थित है। मानसून के दौरान जब लगातार मूसलाधार बारिश होती है, तो गंगा और यमुना दोनों नदियों का जलस्तर तेजी से ऊपर उठने लगता है। चूंकि लेटे हुए हनुमान जी का यह मंदिर संगम के बिल्कुल नजदीक और निचले भू-भाग पर स्थित है, इसलिए जलस्तर बढ़ने पर बाढ़ का पानी प्राकृतिक रूप से गर्भगृह के अंदर तक भर जाता है। हालांकि प्रशासन और मंदिर समिति इस दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करती है, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह प्राकृतिक प्रक्रिया किसी बड़े दिव्य अनुष्ठान से कम नहीं होती है। वे इसे मां गंगा और हनुमान जी के प्रेम का मिलन मानते हैं, जिससे इस स्थान की दिव्यता और अधिक बढ़ जाती है।
नकारात्मक ऊर्जा का नाश और सुख-शांति की स्थापना का प्रतीक है मां गंगा का यह पावन अभिषेक
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मां गंगा द्वारा हनुमान जी के इस वार्षिक स्नान को बहुत बड़ा वरदान माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि जब मां गंगा के पवित्र जल से संकटमोचन हनुमान जी का यह अभिषेक होता है, तो इससे न केवल स्थानीय क्षेत्र बल्कि पूरे देश और समाज से नकारात्मक ऊर्जा, बीमारियां और बाधाएं दूर होती हैं। इस विशेष अवधि के दौरान यहां आने वाले भक्तों को जो आत्मिक शांति और ऊर्जा मिलती है, उसकी तुलना किसी अन्य तीर्थ से नहीं की जा सकती है। यही वजह है कि जब-जब गंगा का पानी मंदिर के अंदर प्रवेश करता है, तब-तब श्रद्धालुओं में एक अलग ही प्रकार का उत्साह, उमंग और गहरी आस्था देखने को मिलती है। लोग इस जल को बहुत ही पवित्र मानते हैं और हनुमान जी के दर्शन मात्र से अपने जीवन को धन्य महसूस करते हैं।