वरलक्ष्मी व्रत 2026: सावन के आखिरी शुक्रवार पर बन रहे 3 अद्भुत संयोग, बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा; जानें सही तारीख और मुहूर्त
हिंदू धर्म में सावन मास का महीना बेहद पवित्र माना जाता है और इस दौरान पड़ने वाले हर एक व्रत-त्योहार का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। सावन के अंतिम शुक्रवार को आने वाला 'वरलक्ष्मी व्रत' (Varalakshmi Vrat 2026) माता लक्ष्मी के वरदान देने वाले स्वरूप को समर्पित है। इस साल सावन के अंतिम शुक्रवार को बहुत ही दुर्लभ और अद्भुत ज्योतिषीय संयोग बनने जा रहे हैं, जिससे इस व्रत का महत्व कई गुना बढ़ गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सच्चे मन से मां वरलक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने से घर में सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और धन-संपत्ति की कभी कोई कमी नहीं होती तथा अष्टलक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
कब है वरलक्ष्मी व्रत 2026 और क्या है इसका धार्मिक महत्व?
पंचांग के नियमों के अनुसार, सावन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से ठीक पहले पड़ने वाले शुक्रवार को वरलक्ष्मी व्रतम के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष (2026) यह अत्यंत पावन व्रत अगस्त महीने के आखिरी चरण में आ रहा है। दक्षिण भारत समेत देश के कई हिस्सों में इस पर्व को 'वरमहालक्ष्मी हब्बा' के रूप में बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति, पति की लंबी आयु और संतान की उन्नति के लिए यह निर्जल या फलाहार व्रत रखती हैं। इस दिन कलश स्थापना करके मां लक्ष्मी के आठों स्वरूपों (अष्टलक्ष्मी) की पूजा की जाती है।
बन रहे हैं 3 अद्भुत और दुर्लभ संयोग, बरसेगी विशेष कृपा
ज्योतिषीय गणना के मुताबिक, इस बार वरलक्ष्मी व्रत के दिन तीन बेहद खास और शुभ योगों का महासंयोग बन रहा है। इन दुर्लभ योगों के निर्माण से माता लक्ष्मी की उन पर असीम कृपा बरसेगी जो विधि-विधान से व्रत का पालन करेंगे। इन पावन योगों के प्रभाव से लंबे समय से अटके हुए वित्तीय कार्य, कारोबार में मुनाफा और कर्ज से मुक्ति मिलने के योग प्रबल हो रहे हैं। पूजा के दौरान विशेष लग्न और चौघड़िया मुहूर्त में मां लक्ष्मी का आह्वान करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक तंगी हमेशा के लिए दूर हो जाती है।
पूजा के दौरान इन नियमों का रखें खास ख्याल और शुभ मुहूर्त
वरलक्ष्मी व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें और ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर के साथ कलश स्थापित करें। कलश में जल, आम के पत्ते, सुपारी और सिक्का रखकर उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। इस दिन दाएं हाथ में पीले रंग का पवित्र रक्षा सूत्र (कलावा) जिसे 'डोराबन्धना' भी कहते हैं, बांधने का विधान है। शाम के समय माता को मिठाई का भोग लगाकर श्रीसूक्त या महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करना बेहद कल्याणकारी माना गया है।