Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन पर राखी बांधते समय क्यों बोला जाता है 'येन बद्धो बली राजा...' मंत्र? जानिए भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और दानवीर राजा बलि से जुड़ी यह अलौकिक पौराणिक कथा

Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन पर राखी बांधते समय क्यों बोला जाता है 'येन बद्धो बली राजा...' मंत्र? जानिए भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और दानवीर राजा बलि से जुड़ी यह अलौकिक पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन का त्योहार केवल भाई-बहन के अटूट स्नेह का पर्व ही नहीं है, बल्कि यह पवित्रता, वचनबद्धता और रक्षा के संकल्प का प्रतीक भी है। इस पावन अवसर पर जब बहनें अपने भाई की कलाई पर रेशमी धागा (राखी) बांधती हैं या पुरोहित अपने यजमानों की कलाई पर रक्षासूत्र (कलावा) सुशोभित करते हैं, तो एक विशेष संस्कृत मंत्र का उच्चारण अनिवार्य रूप से किया जाता है। यह मंत्र अत्यंत प्राचीन है और इसका सीधा संबंध दानवीर राजा बलि, माता लक्ष्मी और भगवान श्री हरि विष्णु से जुड़ा हुआ है।

अक्सर लोग राखी बांधते समय इस मंत्र को सुनते जरूर हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी रोचक पौराणिक कथा और इसके गूढ़ अर्थ से अनजान रहते हैं। आखिर क्यों रक्षाबंधन के पर्व पर दैत्यों के राजा बलि का स्मरण किया जाता है और इस मंत्र के उच्चारण मात्र से रक्षासूत्र की शक्ति सौ गुना कैसे बढ़ जाती है? आइए जानते हैं इस पावन परंपरा के पीछे का पूरा पौराणिक इतिहास और धार्मिक महत्व।

राजा बलि का प्रसिद्ध रक्षा मंत्र और उसका सरल हिंदी अर्थ

रक्षाबंधन और रक्षासूत्र बांधते समय जिस श्लोक का पाठ किया जाता है, वह इस प्रकार है:

"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"

इस पवित्र मंत्र का सरल और भावपूर्ण अर्थ यह है कि "जिस रक्षासूत्र (पवित्र धागे) से अत्यंत पराक्रमी और दानवीर दैत्यराज राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बांधती/बांधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम सदैव अपने कर्तव्य पर स्थिर रहना, कभी अपने वचन और धर्म से विचलित मत होना।"

यह मंत्र भाई को यह स्मरण कराता है कि जिस प्रकार राजा बलि ने अपने दिए गए वचन की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था, उसी प्रकार भाई भी अपनी बहन की रक्षा और अपने कर्तव्यों के प्रति सदैव निष्ठावान रहेगा।

वामन अवतार और दानवीर राजा बलि की कठिन परीक्षा

इस मंत्र की पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण की उस कथा से जुड़ती है जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया था। कथा के अनुसार, प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि अत्यंत शक्तिशाली, धार्मिक और दानवीर राजा थे। उन्होंने अपने तपोबल और पराक्रम से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। राजा बलि 100 अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, जिससे वे देवराज इंद्र का सिंहासन छीनने के समीप पहुंच गए थे।

देवताओं की रक्षा और सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का रूप धारण किया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। राजा बलि अपनी दानशीलता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने वामन देव से अपनी इच्छा अनुसार दान मांगने को कहा। भगवान वामन ने केवल तीन पग (कदम) भूमि मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह स्वयं भगवान विष्णु की लीला है और उन्होंने बलि को दान देने से रोका, लेकिन राजा बलि ने अपने वचन से पीछे हटने से साफ इंकार कर दिया।

भगवान वामन ने अपना विशाल रूप (त्रिविक्रम रूप) धारण किया और एक पग में पूरी पृथ्वी तथा दूसरे पग में समस्त आकाश व देवलोक को माप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो दानवीर राजा बलि ने मुस्कुराते हुए अपना मस्तक भगवान वामन के चरणों में रख दिया। बलि की इस अनुपम भक्ति और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक (सुतल लोक) का राजा बना दिया।

जब भगवान विष्णु बने राजा बलि के द्वारपाल

राजा बलि के समर्पण और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनसे कोई वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने अत्यंत विनम्रता से कहा, "हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि जब भी मैं सुबह अपनी आंखें खोलूं, तो मुझे आपके दर्शन हों। आप सदैव मेरे पाताल लोक के महल के मुख्य द्वार पर द्वारपाल बनकर निवास करें।"

भगवान विष्णु अपने भक्त के इस प्रेमपूर्ण वचन से बंध गए और वैकुंठ धाम छोड़कर पाताल लोक में राजा बलि के महल के पहरेदार बन गए। जब काफी समय बीत जाने के बाद भी भगवान विष्णु वैकुंठ नहीं लौटे, तो माता लक्ष्मी अत्यंत चिंतित हो गईं। उन्होंने देवरषि नारद से भगवान विष्णु की स्थिति के बारे में पूछा। नारद जी ने माता लक्ष्मी को पूरी बात बताई और एक उपाय सुझाया।

देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को बांधी थी संसार की पहली राखी

नारद जी के परामर्श अनुसार, माता लक्ष्मी श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि के दिन एक साधारण और असहाय महिला का वेश धारण करके पाताल लोक पहुंचीं। वे राजा बलि के द्वार पर बैठकर रोने लगीं। जब राजा बलि ने उनसे रोने का कारण पूछा, तो माता लक्ष्मी ने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है जो उनकी रक्षा कर सके, इसलिए वे अत्यंत दुखी और अकेली हैं।

राजा बलि का हृदय पिघल गया। उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा कि आज से वे उन्हें अपनी बहन मानते हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर एक पवित्र धागा (रक्षासूत्र) बांधा और उनकी लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की प्रार्थना की। राजा बलि ने अपनी नई बहन से कहा, "बहन! तुमने मुझे भाई मानकर मेरी कलाई पर यह रक्षासूत्र बांधा है, बताओ तुम्हें उपहार में क्या चाहिए? तुम जो मांगोगी, मैं वही दूंगा।"

तभी माता लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने राजा बलि से कहा, "भैया! यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं, तो उपहार स्वरूप मेरे स्वामी भगवान विष्णु को इस द्वारपाल के बंधन से मुक्त कर दीजिए ताकि वे मेरे साथ वापस वैकुंठ धाम चल सकें।"

राजा बलि का महान त्याग और रक्षाबंधन का आरंभ

राजा बलि अपनी बहन की मांग सुनकर अचंभित रह गए, लेकिन उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने दिए गए वचन का पालन किया। राजा बलि ने भगवान विष्णु को अपने द्वारपाल के कर्तव्य से सहर्ष मुक्त कर दिया और माता लक्ष्मी के साथ वैकुंठ भेजने के लिए तैयार हो गए। राजा बलि के इस महान त्याग और भक्ति से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे प्रतिवर्ष चार महीने (देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक) पाताल लोक में उनके साथ निवास करेंगे।

जिस दिन माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर भगवान विष्णु को मुक्त कराया था, वह श्रावण मास की पूर्णिमा का ही पावन दिन था। तभी से यह परंपरा प्रारंभ हुई कि जब भी बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं, तो वे राजा बलि के उस महान त्याग, वचनबद्धता और रक्षा के संकल्प को याद करते हुए 'येन बद्धो बली राजा...' मंत्र का पाठ करती हैं।

रक्षाबंधन पर इस मंत्र के जाप का आध्यात्मिक व मानसिक महत्व

धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से रक्षाबंधन पर इस मंत्र का पाठ करने के कई गूढ़ लाभ हैं:

  • वचन और कर्तव्य का बोध: यह मंत्र भाई को यह अहसास कराता है कि रक्षा का धागा केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि राजा बलि की तरह हर परिस्थिति में अपनी बहन की रक्षा और सम्मान करने का धर्म है।

  • सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: संस्कृत के इस वैदिक श्लोक के ध्वनि तरंगों से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और रक्षासूत्र की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

  • संकटों से सुरक्षा: यह मंत्र धागे को केवल सूत का टुकड़ा न रखकर उसे एक सुरक्षा कवच (अभेद्य ढाल) में बदल देता है, जो भाई को आने वाली सभी विपत्तियों और अकाल मृत्यु के योग से बचाती है।

रक्षाबंधन पर सही विधि से कैसे बांधें राखी?

शास्त्रों के अनुसार रक्षाबंधन के दिन भद्रा काल का विशेष ध्यान रखना चाहिए और भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में ही राखी बांधनी चाहिए।

  • सबसे पहले पूजा की थाली तैयार करें, जिसमें रोली, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और राखी रखें।

  • भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं।

  • भाई के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाएं तथा सिर पर कोई रुमाल या कपड़ा रखें।

  • इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधते हुए 'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥' मंत्र का कम से कम तीन बार स्पष्ट उच्चारण करें।

  • राखी बांधने के पश्चात भाई की आरती उतारें और उनका मुंह मीठा कराएं। भाई को भी अपनी बहन के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए और सामर्थ्य अनुसार उपहार भेंट करना चाहिए।

राजा बलि और माता लक्ष्मी का यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि रक्षा का वास्तविक अर्थ केवल भौतिक सुरक्षा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान, त्याग और धर्म के रास्ते पर चलने का दृढ़ संकल्प है।

Latest Posts