हरतालिका तीज 2026: सुहागिनें नोट कर लें पूजा की पूरी सामग्री, महादेव को बेहद प्रिय हैं ये 16 तरह की पत्तियां और खास फूल
भारतीय सनातन संस्कृति में पर्व और त्योहारों की एक बेहद समृद्ध और पवित्र परंपरा रही है, जो हमारे पारिवारिक रिश्तों और आध्यात्मिक आस्था को मजबूत करती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले सुहाग के सबसे बड़े महापर्व 'हरतालिका तीज' (Hartalika Teej 2026) का पावन अवसर इस वर्ष 14 सितंबर 2026 को पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह निर्जला व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट और अमर दांपत्य प्रेम के साथ-साथ माता पार्वती द्वारा भोलेनाथ को प्राप्त करने के लिए की गई कठोर और अडिग तपस्या का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, आरोग्य, अखंड सौभाग्य और सुखी पारिवारिक जीवन की मंगलकामना के लिए पूरी निष्ठा के साथ निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं, दूसरी तरफ अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे वर की प्राप्ति और अच्छे जीवनसाथी की कामना के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। हरतालिका तीज की इस पावन पूजा की सबसे बड़ी विशेषता केवल इसका निर्जला उपवास या रात्रि जागरण ही नहीं है, बल्कि इसकी पूजन पद्धति में उपयोग होने वाली वह विशेष प्राकृतिक और मौसमी सामग्री है, जिसका धार्मिक और आयुर्वेदिक दोनों दृष्टियों से गहरा महत्व है।
16 प्रकार की पवित्र पत्तियां और महादेव की पूजा में उनका आध्यात्मिक महत्व
हरतालिका तीज की पारंपरिक और शास्त्रीय पूजा पद्धति में सोलह प्रकार की विशेष पत्रियों यानी पत्तियों (16 types of leaves) और कुछ खास फूलों को अर्पित करने की बेहद प्राचीन परंपरा रही है, जिसका पालन देश के विभिन्न क्षेत्रों में पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। इन पत्तियों का उपयोग न केवल भगवान शिव और माता पार्वती के अर्चन में किया जाता है, बल्कि इससे पूजा के मंडप, वेदी और फुलेरे को भी बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है। तीज की पूजा में जिन 16 तरह की पवित्र पत्तियों को अनिवार्य माना गया है, उनमें बेलपत्र, तुलसी, जातीपत्र, सेवंतिका, बांस पत्र, देवदार पत्र, चंपा, कनेर, अगस्त्य, भृंगराज, धतूरे के पत्ते, आम के पत्ते, अशोक पत्र, पान के पत्ते, केले के पत्ते और शमी पत्र प्रमुख रूप से शामिल बताए गए हैं। इन सभी पत्तियों का महत्व केवल इनकी संख्या तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येकपत्ती का अपना एक अलग आध्यात्मिक और पौराणिक संदेश है। उदाहरण के तौर पर, भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि यह उनके मन को शांत करने वाला माना जाता है, जबकि शमी पत्र भी शिव पूजन की महान परंपरा का एक अहम हिस्सा है। इसी प्रकार, आम और केले के हरे पत्तों का उपयोग मांगलिक कार्यों में पूजा स्थल और मंडप की सजावट के लिए किया जाता है, जो प्रकृति के साथ हमारे गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
धतूरे और आक के फूलों का महत्व तथा माता पार्वती का श्रृंगार
पत्तियों के साथ-साथ हरतालिका तीज के पूजन में कुछ विशेष फूलों का होना भी उतना ही अनिवार्य माना गया है, जो महादेव और माता पार्वती को अत्यधिक प्रिय हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को आक और धतूरे के फूल तथा उनके फल अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए पूजन के दौरान शिवजी को धतूरा और आक के फूल जरूर अर्पित किए जाते हैं। इसके विपरीत, माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए उन्हें लाल गुड़हल का फूल या सुगंधित गुलाब अर्पित करने की परंपरा है। यह पूरा संयोजन इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति की गोद में उगने वाली हर छोटी-बड़ी चीज ईश्वर की आराधना का माध्यम बन सकती है। इसके अलावा, हरतालिका तीज के दिन सुहागिन महिलाओं द्वारा माता पार्वती को समर्पित 'सोलह श्रृंगार' (Solah Shringar) की सामग्री का विशेष रूप से अर्पण किया जाता है। इस सुहाग पिटारी में सिंदूर, लाल बिंदी, कांच या लाख की हरी-लाल चूड़ियां, मेहंदी, सुहाग का जोड़ा, महावर, काजल, कंघी, दर्पण और पैरों के लिए बिछिया जैसी वस्तुएं शामिल होती हैं। माता पार्वती को ये सारी वस्तुएं अर्पित कर महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। पूजा संपन्न होने के बाद कई परिवारों में इन सुहाग की सामग्रियों को किसी सुयोग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद सुहागिन महिला को दान करने की भी सुंदर परंपरा है।
गीली मिट्टी के शिवलिंग निर्माण से लेकर कलश स्थापना और संपूर्ण पूजन सामग्री
हरतालिका तीज के इस पावन व्रत की पूजा विधि बेहद विधान और नियमों के साथ पूरी की जाती है। इस दिन प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व होता है। सबसे पहले हाथों से शुद्ध गीली काली मिट्टी या नदी की बालू लाकर उससे भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बहुत सुंदर प्रतिमाओं या पिंड रूपी शिवलिंग का निर्माण किया जाता है। इसके बाद एक साफ चौकी पर लाल या पीले रंग का नया वस्त्र बिछाकर माता पार्वती और शिवजी की उन प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। पूजा स्थल के पास ही विधि-विधान के साथ कलश की स्थापना की जाती है, जो जल, सुपारी, सिक्का और आम के पत्तों से सुसज्जित होता है। इसके बाद भगवान शिव को रोली, अक्षत, चंदन, जनेऊ, मौली, धूप, दीप, कपूर, नारियल, सुपारी, पान, फल, विभिन्न प्रकार की मिठाइयां और शुद्ध पंचामृत अर्पित किए जाते हैं। शिवजी को बेलपत्र और धतूरा अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी विधिवत पूजा के बाद उन्हें ये सारी वस्तुएं समर्पित की जाती हैं। इस पूरी पूजा के दौरान रात्रि जागरण करने और भजन-कीर्तन करने का विधान है, ताकि माता पार्वती और भोलेनाथ की कृपा से व्रती महिलाओं के घर-परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्यता का वास हमेशा बना रहे।