'या तो शादी करो या युद्ध...': जब राक्षस की जिद पर मां दुर्गा ने धारण किया महाविनाशक चंडिका का उग्र रूप
सनातन धर्म और पौराणिक कथाओं में शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri) के पावन अवसर पर मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। मां दुर्गा के सभी रूपों में उनका चंडिका रूप सबसे अधिक उग्र, शक्तिशाली और दुष्टों का संहार करने वाला माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार बढ़ा है, तब-तब मां ने दैत्यों का नाश करने के लिए चंडिका का विकराल रूप धारण किया है। आइए जानते हैं मां चंडिका की उत्पत्ति और उनके महाविनाशक रूप से जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में।
क्या है मां चंडिका की पौराणिक कथा और उत्पत्ति का रहस्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नाम के दो शक्तिशाली तथा अत्याचारी राक्षसों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था और देवराज इंद्र को उनका सिंहासन छोड़ने के लिए विवश कर दिया था। देवताओं पर आए इस बड़े संकट से मुक्ति पाने के लिए देवराज इंद्र और अन्य सभी देवी-देवता सहायता की गुहार लगाने के लिए माता पार्वती के पास पहुंचे।
देवताओं की पुकार सुनकर मां पार्वती के भीतर से एक अत्यंत तेजोमय और अलौकिक शक्ति प्रकट हुई, जिन्हें 'मां चंडिका' या 'चंडी' के नाम से जाना गया। मान्यता है कि जब राक्षस शुंभ ने माता के अलौकिक सौंदर्य को देखा, तो वह उन पर मोहित हो गया और उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। इस पर माता ने चेतावनी दी कि जो राक्षस युद्ध में उसे हराएगा, वही उससे विवाह करेगा। इसके बाद शुंभ और निशुंभ ने अहंकार में आकर अपनी सेना और महाबली सेनापतियों को युद्ध के लिए भेजा।
चंड और मुंड का वध कर पड़ा 'चंडिका' नाम
शुंभ और निशुंभ के आदेश पर उनके दो सबसे ताकतवर असुर सेनापति 'चंड' और 'मुंड' देवी चंडिका से युद्ध करने के लिए रणक्षेत्र में उतरे। भीषण युद्ध के दौरान मां चंडिका ने अपने क्रोध से ऐसा भयंकर और विकराल रूप धारण किया कि देखते ही देखते उन्होंने चंड और मुंड दोनों का सिर धड़ से अलग कर दिया।
असुरों के इन दोनों सेनापतियों का वध करने के कारण ही माता को 'चंडिका' या 'चंडी' नाम से पुकारा जाने लगा। इसके बाद अहंकारी राक्षस शुंभ और निशुंभ भी स्वयं मां के साथ युद्ध करने आए, लेकिन मां चंडिका ने अपने प्रहार से दोनों का अंत कर दिया और ब्रह्मांड को राक्षसों के आतंक से मुक्त कराया।
हरिद्वार का प्रसिद्ध चंडी देवी मंदिर और उसकी महिमा
भारतवर्ष में मां चंडिका के कई प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां दूर-दूर से भक्त अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं। इनमें से उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित चंडी देवी मंदिर बेहद प्रसिद्ध है। यह मंदिर नील पर्वत के शिखर पर स्थित है और देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शुमार है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र मंदिर की मुख्य मूर्ति की स्थापना महान आध्यात्मिक संत आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं शताब्दी में की गई थी।
मां चंडिका की आराधना करने से भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में विजय और शत्रुओं पर सफलता प्राप्त होती है। यदि किसी जातक के मन में अज्ञात भय या संकट रहता है, तो माता का स्मरण मात्र से सभी विपत्तियां टल जाती हैं। हरिद्वार के अलावा पंचकूला, हापुड़, छत्तीसगढ़, कटक (ओडिशा) और किश्तवाड़ (जम्मू-कश्मीर) में भी मां चंडिका के भव्य मंदिर स्थापित हैं, जहां भक्तों का तांता लगा रहता है।