पिठोरी अमावस्या पर भूलकर भी न करें ये 5 बड़ी गलतियां, वरना नाराज हो सकते हैं पितर और माता पार्वती
सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना गया है, जिसमें पितरों की शांति, तर्पण और भगवान शिव तथा माता पार्वती की उपासना का विधान है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को पिठोरी अमावस्या या कुशग्राहिणी अमावस्या के रूप में जाना जाता है, जो सुहागिन महिलाओं और संतान प्राप्ति के लिए व्रत रखने वाली माताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन माता पार्वती और गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व है ताकि संतान की लंबी उम्र और उज्जवल भविष्य की कामना की जा सके। इसके साथ ही अमावस्या तिथि पर पितरों का ध्यान करने और उनके निमित्त दान-पुण्य करने से जीवन के तमाम संकट दूर होते हैं और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। हालांकि, इस पवित्र दिन कुछ खास नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि जरा सी भी लापरवाही या गलत कार्य आपके घर की सुख-शांति और पितरों की नाराजगी का कारण बन सकते हैं। यदि आप भी पिठोरी अमावस्या के दिन व्रत या पूजा करने जा रहे हैं, तो आपको इसके सभी जरूरी नियमों और वर्जित कार्यों के बारे में विस्तार से जान लेना चाहिए ताकि आपको पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
पंचांग के अनुसार पिठोरी अमावस्या का पर्व साल के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में गिना जाता है, क्योंकि इस दिन एक साथ कई धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। इस दिन स्नान और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पिठोरी अमावस्या के दिन ही माता पार्वती ने इंद्राणी को इस व्रत का महत्व बताया था, जिसके प्रभाव से माता को सुयोग्य संतानों की प्राप्ति हुई थी। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में महिलाएं अपनी संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और खुशहाली के लिए निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं। इसके अलावा इस दिन कुश घास एकत्र करने का भी विधान है, जिसका उपयोग पूरे साल भर के मांगलिक कार्यों, श्राद्ध और अनुष्ठानों में किया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि होती है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार अमावस्या के दिन नकारात्मक ऊर्जाएं अधिक सक्रिय रहती हैं, इसलिए इस दौरान कुछ कार्यों को करने की सख्त मनाही होती है। सबसे पहला नियम यह है कि इस दिन किसी भी गरीब, असहाय, बुजुर्ग या महिला का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से माता लक्ष्मी और पितर दोनों ही नाराज हो जाते हैं। इसके अलावा पिठोरी अमावस्या के दिन तामसिक भोजन जैसे कि मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह दिन पूरी तरह से सात्विक पूजा और संयम के लिए समर्पित होता है। इस दिन बाल और नाखून काटना या दाढ़ी बनाना भी अशुभ माना जाता है, इसलिए इन कार्यों को अमावस्या से एक दिन पहले ही पूरा कर लेना चाहिए। घर में किसी भी प्रकार का वाद-विवाद, कलह या नकारात्मक बातें करने से बचना चाहिए, क्योंकि जिस घर में अशांति होती है, वहां पितृ कभी वास नहीं करते हैं और उनकी तृप्ति नहीं हो पाती है।
पिठोरी अमावस्या का दिन पितरों की तृप्ति के लिए सबसे उत्तम माना जाता है, इसलिए इस दिन तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन का विशेष महत्व होता है। यदि आपके परिवार में पितृ दोष है या आपको बार-बार जीवन में असफलता और परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, तो इस दिन दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों के नाम से जल में काला तिल, कुशा और फूल मिलाकर तर्पण करना चाहिए। इसके साथ ही पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर उसकी परिक्रमा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और राहु-केतु के बुरे प्रभावों से भी राहत मिलती है। इस दिन किसी भूखे व्यक्ति, गाय, कुत्ते या कौवे को भोजन कराना बहुत ही शुभ माना जाता है, क्योंकि ऐसा करने से अन्नदान का पुण्य मिलता है और पितृगण तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं। दान-पुण्य करने से घर की दरिद्रता दूर होती है और माता लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है।
पिठोरी अमावस्या के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए यदि नदी पर जाना संभव न हो, तो घर के पानी में ही थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। स्नान के बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें और सूर्य देव को अर्घ्य देकर अपने दिन की शुरुआत करें। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके वहां गंगाजल का छिड़काव करें और एक चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर माता पार्वती, भगवान गणेश और शिव जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। आटे या पिठ्ठू से विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियां बनाकर उनकी पूजा करने की परंपरा है, इसलिए इसे पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। माता को सुहाग की सामग्री, फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें तथा व्रत कथा का पाठ सुनें या सुनें। अंत में आरती करके अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें, जिससे आपके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और आपको मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी।