बछ बारस गोवत्स द्वादशी : जानिए सही तिथि, सटीक पूजा विधि और क्यों इस दिन दूध-दही व गेंहू से बनी चीजों का सेवन माना जाता है वर्जित
सनातन संस्कृति में पर्वों और व्रतों की एक बेहद समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें प्रकृति, जीव-जंतुओं और विशेषकर गौ माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाले पर्वों का बहुत ही खास और अलौकिक महत्व माना गया है। इसी श्रृंखला में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाए जाने वाले बछ बारस यानी गोवत्स द्वादशी के पावन पर्व का सनातन धर्म में विशेष स्थान है। इस साल बछ बारस का यह पावन व्रत और पर्व पंचांग के भेदों के अनुसार मनाया जा रहा है, जहां कई जगहों पर यह व्रत और पूजा अनुष्ठान किया जा रहा है। माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, यशस्वी जीवन और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के लिए रखा जाने वाला यह व्रत अपने आप में बेहद कठिन और अनुशासन से भरा होता है। इस विशेष दिन पर गाय और उसके बछड़े की पूजा करने का विधान है। इसके साथ ही इस दिन खान-पान से जुड़े कुछ कड़े नियम और परहेज भी पालन किए जाते हैं, जिनके बारे में हर व्रتي महिला को विस्तार से पता होना बेहद जरूरी है ताकि व्रत का पूरा और पुण्य फल प्राप्त हो सके।
बछ बारस का धार्मिक महत्व और संतान की लंबी उम्र के लिए रखे जाने वाले इस व्रत की प्राचीन कथा
गोवत्स द्वादशी या बछ बारस का पर्व मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अपनी संतान के कल्याण और उनकी रक्षा के लिए समर्पित माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और दिनभर उपवास के बाद शाम के समय गौ माता और उनके बछड़े की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। इस पर्व से जुड़ी कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक राजा था जिसके राज्य में बछ बारस के दिन गाय के दूध या उससे बनी चीजों के इस्तेमाल को लेकर एक विशेष नियम का पालन किया जाता था। इस दिन बछड़े की पूजा का विधान इसलिए भी है क्योंकि बछड़ा गाय का प्रिय होता है और गौ सेवा से समस्त देवी-देवताओं का आशीर्वाद स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो माताएं सच्चे मन से इस व्रत को रखती हैं और बछ बारस की कथा सुनती हैं, उनकी संतान पर आने वाले सभी प्रकार के संकट टल जाते हैं और उन्हें दीर्घायु तथा आरोग्यता का वरदान प्राप्त होता है।
गोवत्स द्वादशी की सरल और सटीक पूजा विधि: जानें किस प्रकार करें गौ-बछड़े की आराधना
बछ बारस के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण किए जाते हैं और इस व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा के लिए शाम के समय का यानी प्रदोष काल का समय सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है। इस दिन अपने घर के आस-पास या किसी गौशाला जाकर गाय और उसके बछड़े को स्नान कराकर उन्हें स्वच्छ किया जाता है। इसके बाद गाय और बछड़े को तिलक लगाया जाता है, उनके माथे पर मौली बांधी जाती है और उन्हें फूलों की माला पहनाई जाती है। पूजा की थाली में अक्षत, रोली, धूप, दीप और गुड़ तथा भीगे हुए चने रखे जाते हैं। गौ माता और बछड़े को अंकुरित चने और गेहूं से बनी चीजें श्रद्धापूर्वक खिलाई जाती हैं। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत की कथा सुनी या पढ़ी जाती है और अंत में गौ माता की परिक्रमा कर उनकी आरती उतारी जाती है।
क्यों इस विशेष दिन पर दूध, दही और गेंहू से बनी चीजों का सेवन करना माना जाता है वर्जित
बछ बारस के व्रत की सबसे बड़ी और मुख्य विशेषता इसके कड़े खान-पान के नियम हैं, जिनका पालन हर व्रتي को पूरी निष्ठा के साथ करना पड़ता है। इस दिन किसी भी रूप में गाय के दूध और उससे बनी चीजों जैसे कि दही, मक्खन, घी या पनीर का सेवन करना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। इसके पीछे मुख्य धार्मिक मान्यता यह है कि इस दिन बछड़ा अपने हिस्से का दूध पीता है और बछड़े के अधिकार का दूध या उससे जुड़ी चीजें इंसान को ग्रहण नहीं करनी चाहिए। इसके अलावा, इस दिन भोजन में किसी भी ऐसे अनाज का प्रयोग नहीं किया जाता है जिसे खेतों में हल चलाकर या मशीन से काटा गया हो, यही वजह है कि इस दिन मुख्य रूप से कटे हुए गेहूं और चाकू से काटी जाने वाली सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता है। व्रती महिलाएं इस दिन केवल मूंग, मोठ, बाजरा और बिना कटे या जमीन के अंदर उगने वाले कंदमूल जैसे फलाहार या विशिष्ट व्यंजनों का ही सेवन करती हैं, जिससे व्रत के नियमों का पूर्ण पालन हो सके।
व्रत के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां और इस पर्व का आधुनिक जीवन में संदेश
बछ बारस या गोवत्स द्वादशी का यह पर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे और प्रकृति तथा मूक पशुओं के बीच के गहरे प्रेम और सह-अस्तित्व के रिश्ते को भी मजबूत करता है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं, तब ऐसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। व्रत के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में गौ माता या बछड़े को किसी प्रकार की असुविधा न हो और उनकी सेवा पूरी श्रद्धा के साथ की जाए। पूजा संपन्न होने के बाद गाय और बछड़े को चारा और गुड़ अवश्य खिलाना चाहिए। यदि आप भी इस पावन व्रत को पूरी आस्था के साथ रख रहे हैं, तो इसके सभी नियमों का कड़ाई से पालन करें, ताकि आपके घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहे और आपकी संतान का भविष्य उज्जवल व सुरक्षित हो सके।