राजस्थान: मंच पर भिड़े दिग्गज! जब गोविंद डोटासरा ने महेंद्रजीत मालवीय से छीन लिया माइक और बोले- यहां व्यक्तिगत नारे नहीं लगेंगे
राजस्थान की सियासत में मंच पर नेताओं की बयानबाजी और खींचतान कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल ही में एक ऐसा वाकया सामने आया है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस के दो बड़े दिग्गज नेता आपस में भिड़ गए। यह हाई-वोल्टेज ड्रामा उस समय देखने को मिला जब राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और वरिष्ठ नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय के बीच मंच पर ही तीखी बहस हो गई। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि डोटासरा ने मालवीय के हाथ से माइक तक छीन लिया।
मंच पर अचानक बदला माहौल, जब गूंजे व्यक्तिगत नारे
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कार्यक्रम की शुरुआत सामान्य तरीके से हुई थी और मंच पर तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद थे। इसी दौरान जब महेंद्रजीत सिंह मालवीय भाषण देने के लिए खड़े हुए, तो पंडाल में मौजूद उनके समर्थकों ने उनके पक्ष में जमकर नारेबाजी शुरू कर दी। मंच से व्यक्तिगत तारीफ और खुद के समर्थन में हो रही इस नारेबाजी को देखकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का पारा चढ़ गया। उन्होंने अनुशासन का हवाला देते हुए समर्थकों को शांत रहने का इशारा किया, लेकिन जब नारेबाजी बंद नहीं हुई तो वे सीधे मालवीय की तरफ बढ़ गए।
'यहां व्यक्तिगत नारे नहीं चलेंगे'— डोटासरा का कड़ा रुख
माहौल को बिगड़ता देख गोविंद सिंह डोटासरा ने बिना देर किए महेंद्रजीत सिंह मालवीय के हाथ से माइक अपने हाथ में ले लिया। डोटासरा ने बेहद सख्त लहजे में मंच से ही घोषणा की, "यह पार्टी का मंच है और यहां किसी भी तरह के व्यक्तिगत नारे नहीं बर्दाश्त किए जाएंगे। यहां सिर्फ पार्टी और संगठन के लिए नारे लगेंगे।" डोटासरा के इस कड़े रुख और ऑन-कैमरा माइक छीनने की घटना से वहां मौजूद सभी लोग सन्न रह गए। इसके बाद मंच पर कुछ देर के लिए असहज शांति छा गई।
चुनावी माहौल में अनुशासन का संदेश या आपसी गुटबाजी?
इस घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे लेकर राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि डोटासरा ने ऐसा करके पार्टी में अनुशासन का एक मजबूत संदेश देने की कोशिश की है कि कोई भी नेता संगठन से बड़ा नहीं है। वहीं, दूसरी ओर विपक्षी दल भाजपा और राजनीतिक पंडित इसे राजस्थान कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और गुटबाजी के एक नए अध्याय के रूप में देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद मालवीय और डोटासरा के खेमों में चुप्पी छाई हुई है, लेकिन इस तकरार ने राजस्थान की राजनीति के पारे को एक बार फिर से सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।