अशोक गहलोत के वोटिंग के समय पैर छूने पर मचा बवाल, बीजेपी पहुंची चुनाव आयोग और पोलिंग टीम को घेरा
राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से गहमागहमी अपने चरम पर पहुंच गई है और इस बार मामला पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा मतदान के दौरान एक बुजुर्ग के पैर छूने से जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र के महापर्व यानी वोटिंग के दिन जब सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे थे, ठीक उसी समय इस एक छोटी सी घटना ने पूरे चुनावी माहौल को गरमा दिया है। मतदान केंद्र के भीतर और बाहर की यह तस्वीर देखते ही देखते सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक कार्यालयों तक चर्चा का मुख्य विषय बन गई। स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ी कि भारतीय जनता पार्टी सीधे तौर पर चुनाव आयोग के दरवाजे पर जा पहुंची और पोलिंग टीम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। राजस्थान की सियासत में हमेशा से अपनी सूझबूझ और शांत राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले अशोक गहलोत का यह अंदाज इस बार उनके राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर आ गया है, जिससे चुनावी सरगर्मी और ज्यादा बढ़ गई है।
आखिर क्या था पूरा मामला और क्यों गरमाई सियासत
मतदान के दौरान जब अशोक गहलोत अपना वोट डालने के लिए पोलिंग बूथ के अंदर दाखिल हुए, तो वहां मौजूद एक बुजुर्ग मतदाता का सम्मान करते हुए उन्होंने उनके पैर छू लिए। सामान्य परिस्थितियों में इसे एक राजनेता का आम जनता या बुजुर्गों के प्रति आदरभाव माना जा सकता था, लेकिन चुनाव आचार संहिता और मतदान केंद्र के भीतर के सख्त नियमों के चलते यह मामला विवादों के घेरे में आ गया। विपक्षी पार्टी बीजेपी का यह आरोप है कि इस प्रकार की गतिविधियां सीधे तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश के दायरे में आती हैं और गुप्त मतदान की प्रक्रिया तथा चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों का खुला उल्लंघन करती हैं। जैसे ही यह वीडियो और तस्वीरें सामने आईं, राजनीतिक पंडितों के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या वोटिंग बूथ के अंदर इस तरह का सार्वजनिक आचरण करना चुनावी नियमों के अनुकूल है या फिर यह सहानुभूति हासिल करने का एक राजनीतिक पैंतरा है।
बीजेपी का आक्रामक रुख और चुनाव आयोग में शिकायत
इस पूरी घटना के सामने आने के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कानूनी सेल के प्रतिनिधियों ने आक्रामक रुख अपनाते हुए जयपुर में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय का रुख किया। बीजेपी ने चुनाव आयोग को एक औपचारिक शिकायत सौंपते हुए मांग की कि मतदान केंद्र के भीतर इस तरह का आचरण करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। पार्टी नेताओं का तर्क है कि जब आम मतदाता और साधारण उम्मीदवारों के लिए नियम बेहद कड़े होते हैं, तो एक वरिष्ठ और कद्दावर नेता के लिए इस तरह की छूट देना निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। इस शिकायत के बाद प्रशासनिक अमले में भी हलचल तेज हो गई है क्योंकि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक मतदान केंद्र के अंदर किसी भी तरह का प्रचार या ऐसा कृत्य जिससे मतदाताओं की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, पूरी तरह से वर्जित माना जाता है।
पोलिंग टीम की कार्यप्रणाली पर उठे बड़े सवाल
राजनीतिक बवाल सिर्फ राजनीतिक दलों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि इस पूरी घटना ने पोलिंग बूथ पर तैनात चुनाव अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। बीजेपी ने अपनी शिकायत में इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया है कि जब मतदान केंद्र के अंदर वीडियोग्राफी और इस तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित होती हैं, तब वहां मौजूद पोलिंग टीम ने इसे रोकने के बजाय मूकदर्शक की भूमिका क्यों निभाई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि मतदान कर्मियों ने अपनी जिम्मेदारी को पूरी सख्ती से निभाया होता, तो बूथ के अंदर इस प्रकार का घटनाक्रम होने ही नहीं दिया जाता। इस लापरवाही के चलते अब चुनाव आयोग को संबंधित पोलिंग टीम से स्पष्टीकरण मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिससे प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
राजस्थान चुनाव में आगे क्या असर डालेगा यह विवाद
अशोक गहलोत के इस कदम और उसके बाद उपजे इस बड़े राजनीतिक विवाद का असर आने वाले चुनाव परिणामों और दोनों प्रमुख दलों के बीच की बयानबाजी पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। कांग्रेस पार्टी जहां इसे एक वरिष्ठ राजनेता द्वारा बुजुर्ग के प्रति दिखाए गए स्वाभाविक सम्मान और संस्कृति का हिस्सा बता रही है, वहीं बीजेपी इसे नियमों की धज्जियां उड़ाने वाला कृत्य करार दे रही है। जनता के बीच भी इस मुद्दे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जहां एक वर्ग इसे मानवीय दृष्टिकोण से देख रहा है तो दूसरा वर्ग इसे चुनावी लाभ उठाने की रणनीति मान रहा है। इस प्रकार के विवाद अक्सर चुनावी फिजा को पूरी तरह से बदल देते हैं और यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस मामले में क्या अंतिम निर्णय लेता है और इसका राजनीतिक नफा-नुकसान किस दल को उठाना पड़ता है।