'अंपायर ही पक्षपाती हो तो खेलने का क्या मतलब...' CEC ज्ञानेश कुमार पर बरसे सचिन पायलट, कहा- चुनाव आयोग के खिलाफ हैं पर्याप्त सबूत

'अंपायर ही पक्षपाती हो तो खेलने का क्या मतलब...' CEC ज्ञानेश कुमार पर बरसे सचिन पायलट, कहा- चुनाव आयोग के खिलाफ हैं पर्याप्त सबूत

देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को लेकर छिड़ी सियासी तकरार के बीच कांग्रेस महासचिव और पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर कड़ा प्रहार किया है। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और स्वायत्तता पर तीखे सवाल उठाते हुए सचिन पायलट ने खेल के अंपायर का उदाहरण दिया और कहा कि जब अंपायर ही पहले से पक्षपाती हो जाए, तो फिर मैच खेलने का क्या औचित्य रह जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता आज गंभीर सवालों के घेरे में है और सीईसी ज्ञानेश कुमार के मनमाने फैसलों तथा कथित अनियमिताओं के खिलाफ पर्याप्त और पुख्ता सबूत मौजूद हैं।

"अगर अंपायर ही पक्षपाती हो तो मैच का क्या मतलब": पायलट का सीधा तंज

सचिन पायलट ने चुनावी लोकतंत्र की तुलना क्रिकेट के खेल से करते हुए कहा कि किसी भी स्वस्थ प्रतियोगिता की पहली और बुनियादी शर्त निष्पक्ष नियम और तटस्थ निर्णायक होते हैं। उन्होंने कहा, "जब यह साफ दिखने लगे कि मैच फिक्स है और मैदान पर खड़ा अंपायर ही किसी एक खास टीम की तरफ से खेल रहा हो, तो फिर सामने वाली टीम के लिए खेलने का क्या मतलब रह जाता है?" पायलट ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग का शीर्ष नेतृत्व केंद्र में सत्तारूढ़ व्यवस्था के एक विशिष्ट राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप फैसले ले रहा है, जिससे जनता और विपक्षी दलों का इस संवैधानिक संस्था से भरोसा लगातार कम हुआ है।

मतदाता सूचियों से नाम हटाने और दोनों आयुक्तों को दरकिनार करने का आरोप

पायलट ने आरोप लगाया कि देश कानून और संविधान के तय नियमों से चलता है। निर्वाचन आयोग एक त्रिसदस्यीय निकाय है, जिसमें कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिया जाना चाहिए। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (Revision of Electoral Rolls) और विशेष जांच से जुड़े संवेदनशील फैसलों में आयोग के अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया।

उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय स्तर पर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) के वैधानिक अधिकारों को छीनकर प्रक्रिया का केंद्रीकरण किया गया। पायलट ने दावा किया कि देशभर में मतदाता सूचियों से करोड़ों वैध मतदाताओं के नाम चुन-चुनकर हटाए या अस्थायी रूप से बाहर किए गए हैं। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए कहा कि देश में पहले 'नोटबंदी' हुई थी और अब सुनियोजित तरीके से 'वोटबंदी' की जा रही है।

"उपराष्ट्रपति का इस्तीफा हो सकता है तो CEC का क्यों नहीं?"

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और कानूनी जांच की मांग दोहराते हुए सचिन पायलट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति या पद संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में उपराष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का इस्तीफा हो सकता है, तो फिर मुख्य चुनाव आयुक्त से जवाबदेही क्यों नहीं मांगी जा सकती और उनका त्यागपत्र क्यों नहीं हो सकता? पायलट का कहना था कि जब लगभग 300 निर्वाचित सांसद और विपक्षी प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के समक्ष मतदाता सूची में गड़बड़ियों के सबूत लेकर बात रखने गए, तो उनसे मिलने तक का समय नहीं दिया गया।

पुलिसिया लाठीचार्ज से नहीं दबेगी विपक्ष और युवाओं की आवाज

कांग्रेस नेता ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान विपक्ष के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिसिया कार्रवाई की भी कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना, धरना देना और पदयात्रा निकालना लोकतंत्र में नागरिकों का मौलिक अधिकार है। विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने के बजाय पुलिस बल, लाठियों और मुकदमों के दम पर असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि देश के नौजवान और जागरूक मतदाता अब इस पूरी प्रक्रिया को समझ चुके हैं और दमनकारी नीतियों से सच को छिपाया नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट पर जताया भरोसा, निष्पक्ष जांच की मांग

चुनाव बहिष्कार से जुड़े सवालों को सिरे से खारिज करते हुए पायलट ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस मैदान छोड़ने के पक्ष में नहीं है और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी व जमीनी दोनों मोर्चों पर लड़ाई लड़ी जाएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी को देश की सर्वोच्च अदालत और न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। विपक्ष ने चुनाव आयोग से जुड़ी कथित अनियमितताओं, एकतरफा फैसलों और मतदाता सूची में हेरफेर के पर्याप्त दस्तावेजी सबूत जुटाए हैं, जिन्हें अदालत के समक्ष रखा जा रहा है। उन्होंने मांग की कि चुनाव प्रक्रिया की शुचिता को बहाल करने के लिए इस पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी चाहिए ताकि लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर आम जनता का विश्वास बना रहे।