राजस्थान : बीजेपी ने बागियों पर कसा कड़ा शिकंजा, तो कांग्रेस ने थामी डैमेज कंट्रोल और ‘मनुहार’ की राह

राजस्थान : बीजेपी ने बागियों पर कसा कड़ा शिकंजा, तो कांग्रेस ने थामी डैमेज कंट्रोल और ‘मनुहार’ की राह

राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों नगर निकाय चुनावों की रणभेरी बज चुकी है और जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। चुनाव के इस अहम मोड़ पर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही घर के भीतर छिपे बागी नेताओं और असंतुष्ट उम्मीदवारों को मनाने की बन गई है, जिनकी बगावत किसी भी पार्टी के चुनावी गणित को पूरी तरह बिगाड़ सकती है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी अनुशासित छवि और आक्रामक रणनीति के तहत बगावत करने वाले नेताओं पर सख्त शिकंजा कसना शुरू कर दिया है और स्पष्ट चेतावनी दी है कि पार्टी लाइन से बाहर जाकर काम करने वालों के लिए संगठन में कोई जगह नहीं बचेगी। इसके विपरीत, विपक्षी दल कांग्रेस ने डैमेज कंट्रोल की पुरानी और पारंपरिक शैली अपनाते हुए नाराज नेताओं के घरों तक पहुंचना शुरू कर दिया है और टिकट वितरण से नाखुश चेहरों को मनाने के लिए 'मनुहार' का दौर तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा गर्म है कि चुनाव से ठीक पहले की गई यह कार्रवाई महज़ एक तात्कालिक एक्शन है या फिर चुनाव के बाद आने वाले परिणामों को साधने का कोई पुराना सियासी कनेक्शन, जिस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं।

बीजेपी की सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई और बागियों के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति

भारतीय जनता पार्टी हमेशा से अपनी कैडर-बेस्ड कार्यशैली और पार्टी अनुशासन के लिए जानी जाती है, और निकाय चुनाव के इस घमासान में भी उसका यह रुख साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। टिकट न मिलने से नाराज होकर जब कई स्थानीय नेताओं ने पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशियों के खिलाफ बगावती तेवर अपनाते हुए मैदान में पर्चे दाखिल कर दिए, तो प्रदेश नेतृत्व ने बिना किसी देरी के कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए। पार्टी के शीर्ष स्तर से यह निर्देश जारी कर दिए गए हैं कि जो भी व्यक्ति संगठन के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ेगा या उसका समर्थन करेगा, उसे तुरंत प्रभाव से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया जाएगा। इस सख्त एक्शन के पीछे पार्टी का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कार्यकर्ताओं के बीच कोई गलत संदेश न जाए और चुनावी मैदान में बिखराव की स्थिति को रोका जा सके, ताकि जीत का प्रतिशत पूरी तरह से सुरक्षित रह सके।

कांग्रेस की 'मनुहार' और डैमेज कंट्रोल की राजनीति, रूठों को मनाने के लिए दिग्गजों की दौड़

दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी ने अपनी पारंपरिक शैली के अनुरूप बागियों से निपटने के लिए सख्ती के बजाय सुलह और समझौते का रास्ता चुना है, जिसे राजनीतिक हलकों में 'मनुहार' की राजनीति कहा जाता है। टिकट बंटवारे के बाद से ही कांग्रेस के कई दिग्गज नेता और रणनीतिकार उन कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं जो पार्टी से टिकट न मिलने के कारण बगावत का मन बना चुके थे। नाराज नेताओं को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि पार्टी संगठन में उनकी सेवाओं का पूरा सम्मान किया जाएगा और भविष्य में उनकी राजनीतिक भूमिका को और अधिक मजबूत किया जाएगा। कांग्रेस जानती है कि स्थानीय निकाय के चुनावों में एक-एक वोट कीमती होता है और यदि अपनों की नाराजगी की वजह से मतों का विभाजन हो गया, तो इसका सीधा फायदा विपक्षी दल को मिल सकता है, इसलिए डैमेज कंट्रोल के जरिए घर के बिखरे हुएन तंतुओं को समेटने की यह कवायद युद्धस्तर पर जारी है।

टिकट वितरण की अंतर्कलह और कार्यकर्ताओं के असंतोष से उपजे चुनावी समीकरण

किसी भी चुनाव में टिकट वितरण का वह क्षण सबसे संवेदनशील होता है जब पार्टी के भीतर उम्मीदवारी की चाह रखने वाले दर्जनों दावेदार सामने आते हैं, लेकिन टिकट किसी एक को ही मिल पाता है। इस बार के निकाय चुनावों में भी लगभग सभी राजनीतिक दलों को इसी आंतरिक असंतोष और बगावत का सामना करना पड़ रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर चुनावी समीकरण काफी पेचीदा हो गए हैं। कई वार्डों में तो स्थिति यह है कि मुख्य दलों के आधिकारिक प्रत्याशियों से ज्यादा मजबूत स्थिति में उनके ही दल के बागी उम्मीदवार खड़े नजर आ रहे हैं, जो मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। ऐसे में मतदाताओं का यह संशय और कार्यकर्ताओं का यह बिखराव चुनाव परिणामों को किस करवट बिठाएगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन वर्तमान में यह स्थिति दोनों ही दलों के रणनीतिकारों की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।

चुनाव से पहले का यह एक्शन और चुनाव बाद के सियासी जोड़-तोड़ का दूरगामी कनेक्शन

राजनीति के जानकारों का यह मानना है कि चुनाव के दौरान की जाने वाली यह कार्रवाई और मनुहार का यह खेल केवल वर्तमान चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं से भी जुड़े हुए हैं। चुनाव जीतने के बाद जब नगर निकायों में बोर्ड बनाने और अध्यक्ष या पार्षदों के समर्थन का आंकड़ा जुटाने की बारी आएगी, तब इन्हीं बागी या रूठे हुए नेताओं की भूमिका सबसे अहम हो जाएगी। यही वजह है कि आज जो दल बागियों पर सख्त कार्रवाई का दावा कर रहे हैं, वे भी अंदरखाने इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि चुनाव के बाद यदि त्रिशंकु या कांटे की टक्कर वाली स्थिति बनी, तो इन्हीं निर्दलों और बागियों के समर्थन के बिना काम नहीं चलेगा। कुल मिलाकर, राजस्थान के इन निकाय चुनावों में टिकटों के बंटवारे से शुरू हुआ यह राजनीतिक ड्रामा अब अपने सबसे रोमांचक दौर में पहुंच चुका है, जहाँ हर एक चाल सोच-समझकर चली जा रही है।