तीन दिनों से बीसलपुर बांध में नहीं आ रहा एक बूंद पानी, बारिश थमती ही बढ़ी चिंता, अब कैसे बुझेगी जयपुर-अजमेर की प्यास
राजस्थान के पानी के संकट से जुड़े सबसे बड़े और संवेदनशील मुद्दे पर इस समय प्रदेश के लाखों लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं. अजमेर, जयपुर और टोंक जैसे बड़े शहरों और दर्जनों ग्रामीण इलाकों की प्यास बुझाने वाले ऐतिहासिक बीसलपुर बांध (Bisalpur Dam) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है. पिछले तीन दिनों से लगातार इस बात की पुष्टि हो रही है कि कैचमेंट एरिया और ऊपरी इलाकों से बीसलपुर बांध में पानी की आवक पूरी तरह से शून्य यानी बंद हो चुकी है. मौसम के मिजाज में आए अचानक बदलाव और मानसून की बेरुखी के चलते पिछले कुछ दिनों से क्षेत्र में एक बूंद भी बारिश नहीं हुई है, जिसके कारण बनास और खारी नदियों का रुख भी सूखा नजर आने लगा है. बांध के जलस्तर में हो रही इस अचानक सुस्ती और ठहराव ने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ आम जनता के माथे पर भी चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं. राजस्थान के इन प्रमुख शहरों में पेयजल की आपूर्ति का मुख्य आधार यही बांध है, और यदि आने वाले दिनों में बारिश का यही हाल रहा, तो आने वाले ग्रीष्मकाल में पानी का विकराल संकट पैदा हो सकता है. स्थानीय लोग और किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं कि कब फिर से मूसलाधार बारिश हो और बांध के पेट में जीवनदायिनी पानी की आवक दोबारा शुरू हो सके.
कैचमेंट एरिया में बारिश थमने से थमी बांध की रफ्तार, शून्य पर पहुंची पानी की आवक
किसी भी बड़े बांध का भरना या उसका जलस्तर ऊपर उठना पूरी तरह से उसके कैचमेंट एरिया (Catchment Area) यानी ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में होने वाली मूसलाधार बारिश पर निर्भर करता है. बीसलपुर बांध के मामले में पिछले कुछ दिनों से स्थिति यह बन गई है कि टोंक, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ और उससे जुड़े पर्वतीय या मैदानी इलाकों में बारिश का दौर पूरी तरह से थम चुका है. जल संसाधन विभाग के हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों के अनुसार, पिछले 72 घंटों में बांध में एक क्यूसेक पानी की भी नई आवक दर्ज नहीं की गई है, जिससे यह साफ हो जाता है कि सहायक नदियों के रास्ते बांध तक पहुंचने वाली जलधारा बिल्कुल सूख चुकी है. जब तक ऊपरी इलाकों में तेज बारिश नहीं होगी, तब तक बांध के जलस्तर में कोई प्राकृतिक बढ़ोतरी होना असंभव है. विभाग के इंजीनियर लगातार बनास नदी के बहाव और बांध के गेट्स के पास वाटर लेवल की ऑनलाइन मॉनिटरिंग कर रहे हैं, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लग रही है. पानी की आवक रुकने के साथ-साथ तेज धूप और वाष्पीकरण (Evaporation) के कारण बांध के मौजूदा पानी में से भी रोजाना लाखों लीटर पानी खर्च हो रहा है, जिससे जलस्तर में मामूली गिरावट भी देखने को मिल रही है. स्थिति की नजाकत को देखते हुए बांध प्रबंधन अब पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और वितरण को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने पर विचार कर रहा है ताकि आने वाले महीनों में किसी तरह की आपात स्थिति से निपटा जा सके.
जयपुर, अजमेर और टोंक के जलापूर्ति गणित पर क्या पड़ेगा इस संकट का असर
बीसलपुर बांध से केवल सिंचाई के लिए ही पानी नहीं छोड़ा जाता, बल्कि यह राजस्थान के तीन सबसे महत्वपूर्ण जिलों—राजधानी जयपुर, अजमेर और टोंक के शहरी तथा ग्रामीण इलाकों के लिए पेयजल का एकमात्र सबसे बड़ा स्रोत है. जब भी इस बांध का जलस्तर निर्धारित कोटे से नीचे जाने लगता है, तो प्रशासन को पेयजल की कटौती या सप्लाई के घंटों को सीमित करने का कड़ा फैसला लेना पड़ता है. वर्तमान में भले ही बांध के पास मौजूदा स्टोरेज से कुछ महीनों का काम चल सकता है, लेकिन यदि बारिश ने इसी तरह लंबा विराम दे दिया और तीन दिनों से बंद पड़ी पानी की आवक आगे भी जारी रही, तो यह स्टोरेज तेजी से नीचे खिसक जाएगा. नगर निगम और पीएचईडी (PHED) के अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है कि कैसे पानी की बर्बादी को रोका जाए और लीकेज की समस्याओं को तुरंत दुरुस्त किया जाए. अजमेर और ब्यावर जैसे इलाकों में जहां पहले से ही पानी के संकट की खबरें आती रहती हैं, वहां के निवासियों की धड़कनें इस खबर के बाद से और अधिक तेज हो गई हैं. जानकारों का यह मानना है कि यदि समय रहते मानसून ने दोबारा वापसी नहीं की, तो सरकार को सिंचाई के पानी पर पूरी तरह रोक लगाकर सारा पानी केवल पीने के लिए आरक्षित करना पड़ सकता है, जिससे खेती-किसानी से जुड़े लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ना तय है.
मौसम विभाग का नया अपडेट और मानसून की बेरुखी से किसानों के माथे पर चिंता की शिकन
राजस्थान में इस मानसून सीजन के दौरान बारिश का पैटर्न काफी असमान और उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जहाँ एक तरफ कुछ जिलों में बाढ़ जैसे हालात बने, वहीं दूसरी तरफ बीसलपुर बांध के आसपास का क्षेत्र सूखे की मार झेल रहा है. मौसम विभाग (IMD) के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार, आने वाले कुछ दिनों तक मध्य प्रदेश और राजस्थान के इस हिस्से में भारी बारिश की कोई खास संभावना नहीं है, जिससे किसानों और जल प्रेमियों की चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं. खरीफ की फसलें जो पूरी तरह से मानसून की बारिश और सिंचाई के पानी पर निर्भर करती हैं, उन्हें भी इस सूखे दौर के कारण नुकसान होने की आशंका सताने लगी है. ग्रामीण क्षेत्रों के किसान भगवान इंद्रदेव को मनाने और अच्छी बारिश की कामना के लिए पारंपरिक टोटकों और प्रार्थनाओं का सहारा ले रहे हैं, क्योंकि उनकी साल भर की आजीविका इसी पानी पर टिकी हुई है. प्रशासनिक स्तर पर भी अब यह सलाह दी जा रही है कि आम नागरिक अपने दैनिक जीवन में पानी की एक-एक बूंद का संचय करें और बेवफा नल खुला छोड़ने जैसी आदतों से बाज आएं. प्रकृति के इन उतार-चढ़ाव के बीच बीसलपुर बांध का यह वर्तमान संकट हमें यह सिखाता है कि जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) जैसी तकनीकें आज के समय में कितनी ज्यादा अनिवार्य हो चुकी हैं.