कोटा कांग्रेस टिकट विवाद पहुंचा दिल्ली दरबार; प्रियंका गांधी से 40 मिनट तक चली प्रहलाद गुंजल की गुप्त बैठक, जानिए अंदर की बात

कोटा कांग्रेस टिकट विवाद पहुंचा दिल्ली दरबार; प्रियंका गांधी से 40 मिनट तक चली प्रहलाद गुंजल की गुप्त बैठक, जानिए अंदर की बात

राजस्थान की राजनीति के गलियारों से इस वक्त एक बड़ी और बेहद दिलचस्प खबर सामने आ रही है, जिसने प्रदेश कांग्रेस के भीतर मचे घमासान को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। कोटा-बूंदी क्षेत्र में स्थानीय निकाय चुनावों और सांगठनिक टिकट वितरण को लेकर उपजा विवाद अब शांत होने का नाम नहीं ले रहा है, बल्कि यह मामला सीधे देश की राजधानी दिल्ली स्थित हाईकमान के दरबार तक जा पहुंचा है। कांग्रेस पार्टी के तेजतर्रार नेता और पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल ने नई दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की है। इस उच्चस्तरीय मुलाकात के बाद से ही हाड़ौती से लेकर जयपुर तक के राजनीतिक समीकरणों में सरगर्मी काफी तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर दो गुटों के बीच चल रही खींचतान और टिकट कटने से नाराज समर्थकों के दर्द को अब पूरी प्रमुखता के साथ केंद्रीय नेतृत्व के सामने रख दिया गया है।

10 जनपथ पर करीब 40 मिनट तक चली मैराथन बैठक और किन मुद्दों पर हुई चर्चा

प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रहलाद गुंजल ने नई दिल्ली स्थित 10 जनपथ पर कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री प्रियंका गांधी से मुलाकात की। यह मुलाकात सामान्य शिष्टाचार से कहीं अधिक बढ़कर एक गंभीर राजनीतिक मंथन साबित हुई, जो लगभग 30 से 40 मिनट तक लगातार चलती रही। इस लंबी बैठक के दौरान राजस्थान की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों, संगठन की मजबूती और आगामी रणनीतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आया है कि बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु कोटा क्षेत्र में टिकट वितरण के दौरान हुए हाई-वोल्टेज ड्रामे और गुटबाजी से जुड़ा रहा। गुंजल ने केंद्रीय नेतृत्व को जमीनी हकीकत से अवगत कराते हुए यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि किस प्रकार पार्टी के भीतर कुछ स्थानीय समीकरणों के चलते समर्पित कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों की अनदेखी की जा रही है, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है।

क्या है कोटा का वह पूरा टिकट विवाद जिसके चलते दो खेमों में बंट गई कांग्रेस

कोटा में कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह और टिकट वितरण का यह पूरा मामला पिछले कुछ दिनों से लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। स्थानीय निकाय चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी के भीतर दो स्पष्ट और आमने-सामने के खेमे खड़े हो गए थे। एक तरफ जहां प्रहलाद गुंजल, बूंदी जिला अध्यक्ष महावीर मीणा और रामगंजमंडी के पूर्व प्रत्याशी मनोज राजोरिया जैसे नेता अपने समर्थकों के लिए उचित प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पूर्व मंत्री शांति धारीवाल और अन्य स्थानीय दिग्गज नेताओं का एक मजबूत गुट अलग मोर्चे पर सक्रिय था। स्थिति यहां तक बिगड़ गई थी कि बैठकों के दौरान फाइलें फेंकने और तीखी नारेबाजी तक की नौबत आ गई थी। इस आंतरिक संघर्ष और खींचतान के अंत में जब टिकटों की फाइनल सूची जारी हुई, तो प्रहलाद गुंजल गुट के कई समर्थकों को टिकट वितरण में नजरअंदाज कर दिया गया या उनका पत्ता साफ हो गया। इसी बात से उपजे असंतोष और घुटन को लेकर यह पूरा प्रकरण सीधे राष्ट्रीय राजधानी के दरवाजे तक जा पहुंचा है।

पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और आगामी चुनावों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी हमेशा से ही गुटबाजी और क्षत्रपों की आपसी खींचतान से जूझती रही है, और कोटा का यह ताजा घटनाक्रम उसी पुरानी बीमारी का एक नया रूप नजर आता है। एक तरफ जहां पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा यह मानते रहे हैं कि प्रहलाद गुंजल जैसे जमीन से जुड़े नेता ने कड़ा संघर्ष किया है और उन्हें पूरा स्पेस मिलना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर पारंपरिक वर्चस्व की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते इस अंतर्कलह को केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नहीं सुलझाया गया, तो आने वाले स्थानीय और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में हैं कि वे किस गुट का समर्थन करें और किसके साथ आगे बढ़ें। ऐसे में प्रियंका गांधी के साथ हुई इस लंबी मंत्रणा के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि हाईकमान इस मामले में जल्द ही कोई कड़ा या मध्यस्थता वाला फैसला ले सकता है, जिससे कोटा में पार्टी की नैया को एक स्पष्ट दिशा मिल सके।

दिल्ली दरबार के हस्तक्षेप से क्या बदलेगी कोटा की सियासत की तस्वीर

प्रहलाद गुंजल और प्रियंका गांधी के बीच हुई इस मुलाकात के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्रीय नेतृत्व इस पूरे विवाद पर क्या एक्शन लेता है। क्या कोटा कांग्रेस में चल रही इस दो-फाड़ की स्थिति को पाटने के लिए कोई नया फॉर्मूला तैयार किया जाएगा, या फिर असंतुष्ट नेताओं को दरकिनार कर स्थानीय समीकरणों को ही अंतिम सत्य मान लिया जाएगा? राजनीति के जानकारों का कहना है कि गुंजल ने अपनी बात पूरी मजबूती के साथ हाईकमान के सामने रख दी है और गेंद अब पूरी तरह से दिल्ली के पाले में है। यदि समय रहते इस आंतरिक असंतोष को शांत नहीं किया गया, तो यह चिंगारी आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक बवंडर बन सकती है। फिलहाल, इस 40 मिनट की मुलाकात ने राजस्थान की सियासत में एक बार फिर गर्माहट ला दी है और हर कोई यह कयास लगाने में जुटा है कि आने वाले दिनों में कोटा कांग्रेस की अंदरूनी कलह का क्या और कैसा क्लाइमेक्स देखने को मिलेगा।