पंजाब में बीजेपी और अकाली गठबंधन के रास्ते में फंसा सीएम फेस का पेंच, सुखबीर बादल के नाम पर बीजेपी असहमत

पंजाब में बीजेपी और अकाली गठबंधन के रास्ते में फंसा सीएम फेस का पेंच, सुखबीर बादल के नाम पर बीजेपी असहमत

पंजाब की राजनीति में एक बार फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है क्योंकि आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि, दोनों दलों के बीच पुरानी दूरियां मिटाने और साथ आने की कोशिशों के बीच एक बहुत बड़ा सियासी पेच फंस गया है。 सामने आ रही रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी आलाकमान और राज्य के नेता सुखबीर सिंह बादल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा (CM Candidate) मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं, जिसके कारण दोनों दलों के बीच चल रही अंदरूनी बातचीत में एक नई बाधा खड़ी हो गई है।

गठबंधन की चर्चाओं के बीच नेतृत्व का विवाद

पंजाब की सियासत में पिछले कुछ महीनों से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि क्या अकाली दल और बीजेपी एक बार फिर साल 2020 से पहले वाले पुराने रिश्तों को बहाल करेंगे। कृषि कानूनों के विरोध और किसान आंदोलन के चलते दोनों पार्टियों की ढाई दशक पुरानी पुरानी दोस्ती टूट गई थी, जिसके बाद से दोनों दलों ने अपने-अपने बलबूते पर ही चुनावी मैदान में किस्मत आजमाई थी। लेकिन बदले हुए राजनीतिक समीकरणों और क्षेत्रीय संतुलन को साधने के लिए एक बार फिर से दोनों दलों के बीच गठबंधन की सुगबुगाहट शुरू हुई है। दिल्ली में हाल ही में हुई कुछ उच्च-स्तरीय बैठकों के बाद से इन अटकलों को और हवा मिली है, परंतु जैसे ही सीटों और नेतृत्व के बंटवारे पर बात पहुंची, मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।

सीटों के बंटवारे और बड़े भाई की भूमिका पर रस्साकशी

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में केवल मुख्यमंत्री के चेहरे का विवाद ही नहीं, बल्कि विधानसभा सीटों के बंटवारे का फार्मूला भी एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। अकाली दल के नेताओं का यह स्पष्ट तर्क रहा है कि पंजाब की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए उनकी पार्टी को गठबंधन के भीतर 'बड़े भाई' की भूमिका मिलनी चाहिए। अकाली खेमे का मानना है कि पंथिक पार्टी होने के नाते और ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पुरानी मजबूत पकड़ के आधार पर उन्हें ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिलना चाहिए। दूसरी ओर, बीजेपी का अंदरूनी धड़ा इस पुरानी फॉर्मूले पर राजी होने के लिए तैयार नहीं है। भगवा पार्टी का मानना है कि पिछले कुछ चुनावों में पंजाब के अंदर उसका सांगठनिक आधार काफी मजबूत हुआ है और शहरी के साथ-साथ कई अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी उसकी स्थिति पहले से बेहतर हुई है। ऐसे में बीजेपी कम सीटों पर समझौता करने के मूड में नहीं है और वह बराबरी या अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है।

बीजेपी का स्टैंड और सामूहिक नेतृत्व का विकल्प

भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक मजबूत धड़ा यह मान रहा है कि गठबंधन की स्थिति में भी चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का कोई चेहरा घोषित नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी का रुख यह है कि पहले राजनीतिक और चुनावी प्रदर्शन पर पूरी तरह फोकस किया जाना चाहिए तथा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही आम सहमति से विधायक दल के नेता या नेतृत्व पर कोई अंतिम फैसला लिया जाना चाहिए। इसके अलावा, सरकार बनने की स्थिति में उपमुख्यमंत्री पद के फार्मूले को लेकर भी अंदरखाने चर्चाएं चल रही हैं, ताकि दोनों दलों के बीच सत्ता संतुलन को साधा जा सके। हालांकि, सुखबीर सिंह बादल को सीधे तौर पर सीएम उम्मीदवार के रूप में स्वीकार न करने का बीजेपी का यह कड़ा रुख अकाली दल के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि अकाली पार्टी अपने शीर्ष नेतृत्व को ही प्रोजेक्ट कर मैदान में उतरना चाहती है।

राजनीतिक भविष्य और आगे की राह

पंजाब की सियासत में आम आदमी पार्टी (आप) की मजबूत मौजूदगी और कांग्रेस की सक्रियता के बीच यदि अकाली दल और बीजेपी आपस में हाथ मिलाते हैं, तो यह मुकाबला निश्चित रूप से काफी दिलचस्प हो जाएगा। लेकिन गठबंधन की यह गाड़ी पटरी पर तभी उतरेगी जब दोनों दल अपनी-अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं को छोड़कर किसी व्यावहारिक समझौते पर पहुंचेंगे। एक तरफ जहां अकाली दल अपने अस्तित्व और खोए हुए जनाधार को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं बीजेपी भी पंजाब में अपने पैर जमाने के लिए एक बड़े क्षेत्रीय सहयोगी की तलाश में है। ऐसे में देखना यह होगा कि क्या शीर्ष स्तर पर हो रही इन बैठकों में सीएम चेहरे के इस पेच को सुलझाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकल पाता है या फिर दोनों दल एक बार फिर अकेले ही अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरने का जोखिम उठाते हैं।

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