बादल परिवार को बड़ा झटका: प्रकाश सिंह बादल के करीबी रिश्तेदार मेजर भूपिंदर सिंह ने थामा बीजेपी का दामन
पंजाब की सियासत से इस वक्त की एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। राज्य के पांच बार मुख्यमंत्री रहे शिरोमणि अकाली दल के दिग्गज नेता दिवंगत प्रकाश सिंह बादल (Parkash Singh Badal) के परिवार से जुड़ा एक बड़ा नाम अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गया है। प्रकाश सिंह बादल के चचेरे भाई और उनके राजनीतिक सचिव रहे सेवानिवृत्त मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों (Major Bhupinder Singh Dhillon) ने चंडीगढ़ में औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली है। उनके साथ उनके बेटे और सनौर के नगर पालिका अध्यक्ष अमरवीर सिंह बादल ने भी भगवा पार्टी का दामन थाम लिया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब बीजेपी के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों की मौजूदगी में हुए इस राजनीतिक घटनाक्रम ने ऐसे समय में तूल पकड़ा है जब अकाली दल और बीजेपी के बीच आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर संभावित गठबंधन की चर्चाएं चल रही हैं। इस बड़े राजनीतिक फेरबदल के बाद अब यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि क्या बादल परिवार के इस कदम से अकाली दल और बीजेपी के रिश्तों पर कोई असर पड़ेगा और आने वाले दिनों में इसका पंजाब की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
कौन हैं मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों और क्यों रहा है उनका राजनीतिक रसूख?
मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों (78 वर्ष) केवल प्रकाश सिंह बादल के पारिवारिक रिश्तेदार ही नहीं बल्कि उनके सबसे भरोसेमंद रणनीतिकारों और बैकस्टेज ट्रबलशूटर के रूप में जाने जाते रहे हैं। उनके पिता गुरराज सिंह ढिल्लों देश के पहले राज्य सभा सांसदों में से एक थे और उन्होंने 1952 से 1958 तक अकाली दल का प्रतिनिधित्व किया था। मेजर भूपिंदर सिंह ने भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी हिस्सा लिया था और बाद में राजनीति में आकर प्रकाश सिंह बादल के साथ मिलकर पार्टी के लिए लंबे समय तक काम किया। जब प्रकाश सिंह बादल 1997 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे, तब भूपिंदर सिंह को उनका राजनीतिक सचिव नियुक्त किया गया था। वे बादल परिवार के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले लंबी निर्वाचन क्षेत्र और मलवा बेल्ट में पर्दे के पीछे रहकर पार्टी की रणनीति तैयार करने और जमीनी स्तर पर रूठे हुए नेताओं को मनाने का काम बखूबी करते रहे हैं।
क्या अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन की अटकलों के बीच आया है यह नया मोड़?
पंजाब में पिछले कुछ महीनों से इस बात की लगातार चर्चाएं चल रही हैं कि क्या कभी पुराने सहयोगी रहे शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) आगामी विधानसभा चुनावों के लिए फिर से हाथ मिला सकते हैं। किसान आंदोलन के दौरान कृषि कानूनों के विरोध में दोनों दलों का दशकों पुराना गठबंधन टूट गया था, जिसके बाद से दोनों ही दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। हाल ही में कुछ नेताओं की मुलाकातों के बाद से गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हुई थी, लेकिन इसी बीच परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य का बीजेपी में शामिल होना राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे रहा है। हालांकि, बीजेपी में शामिल होने के बाद मेजर भूपिंदर सिंह ने यह स्पष्ट किया है कि भले ही उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा बदलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों से प्रभावित होकर बीजेपी का दामन थामा हो, लेकिन सुखबीर सिंह बादल और परिवार के साथ उनके खून के रिश्ते हमेशा वैसे ही बने रहेंगे और उनके मन में किसी के प्रति कोई कड़वाहट नहीं है।
मालवा क्षेत्र में बीजेपी की पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मेजर भूपिंदर सिंह ढिल्लों और उनके बेटे का बीजेपी में आना पार्टी की उस सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह पंजाब के मालवा क्षेत्र में अपनी संगठनात्मक पकड़ और जनाधार को तेजी से विस्तार देना चाहती है। बीजेपी नेतृत्व का यह मानना है कि जमीनी स्तर के ऐसे अनुभवी नेताओं को पार्टी में शामिल करने से सिख बहुल क्षेत्रों और पारंपरिक राजनीतिक परिवारों के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ती है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी इस दौरान चुटकी लेते हुए कहा कि जिस तरह से 'बादल' अब बीजेपी के साथ आए हैं, उससे राज्य में विकास की बारिश तेज होगी और पार्टी आगामी चुनावों में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरेगी। दूसरी ओर, अकाली दल के प्रवक्ताओं का यह कहना है कि भूपिंदर सिंह लंबे समय से पार्टी के सक्रिय पदों पर नहीं थे, इसलिए उनके जाने से पार्टी की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन अंदरखाने इस घटनाक्रम को एक प्रतीकात्मक झटके के रूप में जरूर देखा जा रहा है।
आने वाले चुनावों से पहले पंजाब की राजनीति में गरमाया सियासी माहौल
जैसे-जैसे पंजाब में विधानसभा चुनावों का वक्त नजदीक आ रहा है, राज्य की राजनीति में पाला बदलने और नए समीकरणों के बनने का दौर तेजी से शुरू हो गया है। एक तरफ जहां पारंपरिक क्षेत्रीय दल अपने पुराने कुनबे को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं राष्ट्रीय दल अपनी रणनीतिक पहुंच के जरिए हर संभव जमीन तलाशने में जुटे हैं। प्रकाश सिंह बादल के परिवार के करीबी और उनके राजनीतिक सारथी रहे व्यक्ति का इस तरह भगवा दल का हाथ थामना यह साबित करता है कि पंजाब की सियासत में आने वाले दिनों में सत्ता के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प, रोमांचक और तीखा होने वाला है, जिस पर हर राजनीतिक प्रेक्षक की पैनी नजर बनी हुई है।