पूर्व CEC एसवाई कुरैशी पर भड़के तेजतर्रार पूर्व आईएएस अशोक खेमका
भारतीय प्रशासनिक सेवा और देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़े एक बड़े घटनाक्रम में नौकरशाही और संवैधानिक पदों पर बैठे दिग्गजों के बीच तीखी जुबानी जंग छिड़ गई है। हरियाणा के अपनी ईमानदारी और बेबाक अंदाज के लिए देश भर में मशहूर रहे पूर्व आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एसवाई कुरैशी के एक हालिया बयान पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अशोक खेमका ने साफ शब्दों में कहा है कि एक पूर्व संवैधानिक पद पर आसीन रहे व्यक्ति द्वारा इस तरह के निचले स्तर के प्रहार करना कतई शोभा नहीं देता है। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी ने एक डिजिटल पॉडकास्ट के दौरान देश के वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका को लेकर कुछ ऐसे दावे किए, जिन्होंने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भूचाल ला दिया। इस बयान के सामने आने के बाद से ही देश भर में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है कि क्या संवैधानिक पदों पर रह चुके लोगों को इस तरह के सार्वजनिक बयान देने चाहिए या नहीं।
एसवाई कुरैशी के उस पॉडकास्ट का पूरा सच, जिसमें उठे थे चुनाव आयोग की नियुक्ति पर सवाल
यह पूरा विवाद तब तूल पकड़ा जब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी एक लोकप्रिय पॉडकास्ट 'लंदन वार्ता' में बतौर अतिथि शामिल हुए थे। इस बातचीत के दौरान उन्होंने पत्रकार के साथ देश की निर्वाचन प्रणाली, चुनाव आयोग के अधिकारों और वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के चयन से जुड़े कई संवदेनशील मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। पॉडकास्ट के दौरान कुरैशी ने दावा किया कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अतीत में ज्ञानेश कुमार को केंद्रीय स्तर पर 'एडिशनल सेक्रेटरी' और बाद में 'क्रेटरी' पैनल के लिए भी उपयुक्त या योग्य नहीं माना गया था, लेकिन गृह मंत्रालय में अमित शाह के अधीन कार्य करने और उनकी नजदीकी के चलते उन्हें सहकारिता मंत्रालय में सचिव पद की जिम्मेदारी मिल गई। इसके साथ ही कुरैशी ने यह भी दावा किया कि जम्मु-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की ऐतिहासिक प्रक्रिया और राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के दौरान मुख्य रणनीतिकारों में ज्ञानेश कुमार की अहम भूमिका रही थी। उन्होंने 2023 के नए कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त की चयन प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए, जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री (अमित शाह) और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।
अशोक खेमका का तीखा पलटवार, संवैधानिक गरिमा और 'बिलो द बेल्ट' बयान पर जताई कड़ी आपत्ति
पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी के इन बयानों और दावों के सार्वजनिक होने के बाद सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर कड़ा ऐतराज जताया और अपनी भड़ास निकाली। अपनी बेबाक शैली के लिए जाने जाने वाले अशोक खेमका ने लिखा कि देश के किसी भी नागरिक को असहमति जताने का हक है और वैचारिक मतभेद होना पूरी तरह से जायज है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि व्यक्तिगत छींटाकशी की जाए और गरिमा की सारी हदें पार कर दी जाएं। खेमका ने पूर्व सीईसी के बयानों को सीधे तौर पर 'बिलो द बेल्ट' यानी नियमों के दायरे से बाहर जाकर किया गया ओछा प्रहार करार दिया। उन्होंने विशेष रूप से उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के मामले को राजनीतिक कोण से देखा गया था। अशोक खेमका ने दो टूक शब्दों में कहा कि देश के मुकुट जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना कोई साधारण फैसला नहीं था, बल्कि यह प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय और एक महान राष्ट्रीय उपलब्धि है। उन्होंने नसीहत दी कि राजनीतिक द्वेष और पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर हमेशा देश की संवैधानिक संस्थाओं और उनकी गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, एसआईआर और प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर गरमाई सियासत
इस पूरे घटनाक्रम ने केवल दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच की बयानबाजी को ही हवा नहीं दी है, बल्कि इसने देश की सबसे बड़ी स्वायत्त संस्था यानी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी चयन प्रक्रिया को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। पॉडकास्ट के दौरान एसवाई कुरैशी ने मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (Intensive Revision - SIR) और आयोग के कानूनी अधिकारों पर भी चर्चा की थी। उन्होंने तर्क दिया था कि तकनीकी और कंप्यूटराइज्ड युग में जहां डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहता है, वहां बार-बार इस प्रकार के व्यापक संशोधनों की जरूरत पर पुनर्विचार होना चाहिए। हालांकि, चुनाव आयोग और सरकार के आलोचकों का एक धड़ा इन बयानों को अपने राजनीतिक एजेंडे के तहत इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है, वहीं अशोक खेमका जैसे देश के वरिष्ठ और ईमानदार प्रशासक का मैदान में उतरकर यह कहना कि संस्थाओं के पूर्व प्रमुखों को अपनी गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, इस पूरे विवाद का दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। जानकारों का मानना है कि जब प्रशासनिक सेवा के दिग्गज इस तरह खुलकर आमने-सामने आते हैं, तो यह व्यवस्था में पारदर्शिता और अनुशासन पर एक गंभीर सवालिया निशान छोड़ जाता है।
अशोक खेमका का बेबाक और कड़क प्रशासनिक इतिहास, जो हमेशा सच्चाई के लिए लड़े
यह पहली बार नहीं है जब अशोक खेमका ने किसी बड़े मुद्दे पर अपनी स्पष्ट और बेबाक राय रखी हो। हरियाणा कैडर के 1991 बैच के आईएएस अधिकारी रहे अशोक खेमका अपने 34 साल के लंबे और संघर्षपूर्ण प्रशासनिक करियर के दौरान कुल 57 से अधिक तबादलों का सामना करने के लिए देश भर में जाने जाते हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई बड़े भ्रष्टाचार घोटालों और अनियमितताओं का पर्दाफाश किया, जिसकी वजह से उन्हें लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक दबावों का सामना करना पड़ा। रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ भूमि सौदे से जुड़े म्यूटेशन मामले को रद्द करने के उनके फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। इसके अलावा हरियाणा बीज निगम के प्रबंध निदेशक के रूप में उन्होंने बीजों की खरीद में हुए बड़े घोटाले का भी पर्दाफाश किया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी इस अटूट निष्ठा और ईमानदारी के दम पर उन्होंने जनता के बीच एक 'भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा' की छवि बनाई है। यही कारण है कि जब प्रशासनिक और संवैधानिक मर्यादाओं के हनन की बात आती है, तो अशोक खेमका बिना किसी डर के खुलकर अपनी बात रखते हैं, और उनका यह नया बयान भी उसी साहसिक और राष्ट्रहित की सोच का एक हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इस बयान के दूरगामी मायने और भविष्य की दिशा
पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी पर अशोक खेमका के इस कड़े प्रहार के बाद देश की राजनीति और नौकरशाही के दायरे में कई तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की बयानबाजी से न केवल संवैधानिक संस्थाओं की छवि प्रभावित होती है, बल्कि देश के प्रशासनिक ढांचे में काम कर रहे युवा अधिकारियों के सामने भी एक नकारात्मक संदेश जाता है। एक तरफ जहां विपक्षी दल चुनाव आयोग की नियुक्तियों और पारदर्शिता को लेकर लगातार सरकार पर हमलावर हैं, वहीं दूसरी तरफ खेमका का यह बयान यह साबित करता है कि देश का एक पढ़ा-लिखा और कर्तव्यनिष्ठ प्रबुद्ध वर्ग व्यक्तिगत और राजनीतिक द्वेष से ऊपर उठकर राष्ट्रहित और संवैधानिक गरिमा को सबसे ऊपर रखता है। अनुच्छेद 370 जैसी राष्ट्रीय उपलब्धियों को राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय उनके सम्मान की रक्षा करने की बात कहकर खेमका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की अखंडता से जुड़े मुद्दों पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या पूर्व सीईसी की ओर से इस पर कोई सफाई आती है या फिर यह विवाद यहीं थम जाता है, लेकिन इसने यह जरूर तय कर दिया है कि देश की नौकरशाही में वैचारिक मतभेद अब खुलेआम मंचों पर सतह पर आने लगे हैं।