पराली जलाने से रोकने में भगवंत मान सरकार का शानदार काम

पराली जलाने से रोकने में भगवंत मान सरकार का शानदार काम

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सर्दियों की आहट के साथ ही हर साल जिस एक सबसे गंभीर समस्या पर सबसे ज्यादा बहस होती थी, वह थी खेतों में धान के अवशेष यानी पराली जलाना। इस जहरीले धुएं की वजह से दिल्ली-एनसीआर से लेकर पूरे पंजाब और हरियाणा तक हवा का स्तर बेहद खतरनाक श्रेणी में पहुंच जाता था, जिससे सांस लेना तक दूभर हो जाता था। लेकिन इस बार पंजाब से एक ऐसी राहत भरी और बेहद सुखद खबर सामने आई है, जिसने पूरे देश के पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं को चौंका दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार के अथक प्रयासों, कृषि विभाग की जागरूकता रणनीतियों और सबसे बढ़कर राज्य के समझदार किसानों के सहयोग से इस साल पराली जलाने की घटनाओं में पिछले साल के मुकाबले 93 प्रतिशत से भी ज्यादा की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि यदि सही दिशा में ठोस प्रयास किए जाएं, तो दशकों पुरानी इस बड़ी समस्या का समाधान भी पूरी तरह संभव है।

कैसे संभव हुआ यह चमत्कार: सरकार द्वारा उठाए गए जमीनी कदम और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल

आखिर पिछले कुछ वर्षों में ऐसा क्या बदलाव आया है कि जिस पंजाब पर पराली जलाने के सबसे ज्यादा आरोप लगते थे, वहां आज खेतों में आग लगाने की घटनाएं न के बराबर रह गई हैं। इसके पीछे राज्य सरकार की ओर से अपनाई गई एक सुनियोजित और बेहद प्रभावी रणनीति है। कृषि विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों ने मिलकर इस बार धान की कटाई के समय से ही किसानों तक सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, स्मार्ट सीडर और बेलर जैसी आधुनिक कृषि मशीनरी की उपलब्धता सुनिश्चित की। सरकार द्वारा इन मशीनों की खरीद पर किसानों को भारी सब्सिडी मुहैया कराई गई, ताकि हर वर्ग का किसान बिना आर्थिक दबाव के इन उन्नत यंत्रों का इस्तेमाल कर सके। इसके अलावा, राज्यभर में जिला प्रशासन और कृषि अधिकारियों की विशेष टीमों ने गांवों में जाकर चौपालें लगाईं, किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में समझाया और इसके प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों से अवगत कराया। जब सरकार और किसान दोनों ने मिलकर एक टीम की तरह काम किया, तो इसके परिणाम भी उतने ही शानदार और उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर सामने आए।

पंजाब के अन्नदाताओं की बदलती सोच और पर्यावरण के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता

इस पूरी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय यदि किसी को जाता है, तो वे हैं पंजाब के मेहनतकश और जागरूक किसान। एक वक्त था जब किसानों के पास कटाई के बाद फसल के अवशेषों को निपटाने के लिए समय और आर्थिक संसाधन दोनों की कमी होती थी, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में खेतों में आग लगानी पड़ती थी। लेकिन समय के साथ पंजाब के अन्नदाताओं ने यह समझ लिया है कि जिस धरती मां से वे अपनी आजीविका चलाते हैं, उसकी सेहत और आबोहवा को बचाना उनका भी उतना ही नैतिक कर्तव्य है। आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अब किसान पराली जलाने के बजाय उसे मिट्टी में मिलाने या बेल बनाकर बायोमास प्लांट और पराली आधारित उद्योगों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। गांवों में किसानों ने खुद आगे बढ़कर यह संकल्प लिया है कि वे अपने इलाके को धुएं से मुक्त रखेंगे और आने वाली पीढ़ी को एक साफ-सुथरा और स्वस्थ वातावरण सौंपेंगे। किसानों की इस सकारात्मक सोच ने प्रशासनिक प्रयासों को और अधिक मजबूती प्रदान की है।

आने वाले समय के लिए एक मिसाल बना पंजाब का यह सफल मॉडल

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में आई इस 93 प्रतिशत से अधिक की गिरावट ने पूरे देश के सामने एक बेहतरीन और अनुकरणीय मॉडल पेश किया है। पर्यावरण और प्रदूषण नियंत्रण पर काम करने वाली राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी पंजाब सरकार और वहां के किसानों के इस संयुक्त प्रयास की भरपूर सराहना की है। हालांकि प्रशासन का मानना है कि भले ही आंकड़े बहुत संतोषजनक हैं, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य इस संख्या को शून्य पर लाना है ताकि सर्दियों के मौसम में लोगों को साफ हवा मिल सके। आने वाले सत्रों में सरकार कृषि विविधीकरण, फसल अवशेष प्रबंधन के लिए और अधिक वित्तीय सहायता और पर्यावरण हितैषी योजनाओं को धरातल पर उतारने की तैयारी कर रही है। यदि इसी तरह की इच्छाशक्ति और जनसहयोग बना रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब पंजाब की खेती पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त और आधुनिक तकनीक पर आधारित हो जाएगी, जो देश के बाकी राज्यों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगी।