पंजाब में गहराया सियासी संकट: काले झंडों के विरोध से लेकर लाठीचार्ज तक, स्कूलों की बदहाली से लेकर आवारा कुत्तों का आतंक
पंजाब की राजनीति में इन दिनों उथल-पुथल का दौर अपने चरम पर है और राज्य की भगवंत मान सरकार एक के बाद एक कई मोर्चों पर चौतरफा घिरती नजर आ रही है। कभी अपनी कल्याणकारी योजनाओं और बदलाव के दावों के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी की सरकार के सामने इस समय कानून व्यवस्था, शिक्षा तंत्र, प्रशासनिक नीतियों और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े ऐसे तमाम गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिनका जवाब देना सत्ता पक्ष के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में विपक्षी दलों, किसान संगठनों, बेरोजगार युवाओं और आम नागरिकों द्वारा लगातार किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक पारे को काफी हाई कर दिया है। स्थिति यहाँ तक पहुंच चुकी है कि मंत्रियों और विधायकों के दौरों के दौरान काले झंडे दिखाने की परंपरा आम हो चली है, जिसके जवाब में पुलिस प्रशासन द्वारा कई जगहों पर सख्त लाठीचार्ज की घटनाएं भी सामने आई हैं। गांवों से लेकर शहरों तक सुलग रहे इन तमाम विवादों ने मान सरकार की कार्यशैली पर कई बड़े और तीखे सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं, जिससे प्रशासनिक गलियारों में भी खलबली मची हुई है।
काले झंडों का विरोध और पुलिसिया लाठीचार्ज से सुलगता पंजाब का राजनीतिक माहौल
पंजाब के विभिन्न जिलों में इन दिनों मुख्यमंत्री भगवंत मान और उनके कैबिनेट मंत्रियों को जनता के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जो इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर असंतोष किस हद तक बढ़ चुका है। जब कभी मंत्री या विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यों के उद्घाटन या जनसभाओं के लिए पहुंचते हैं, तो युवा संगठनों, किसानों और विभिन्न यूनियनों के लोग हाथों में काले झंडे लेकर उनके काफिले को घेर लेते हैं। इस लोकतांत्रिक विरोध को शांत करने के लिए कई मौकों पर पुलिस बल द्वारा हद दर्जे की सख्ती बरती गई है, जिसमें प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने और उन्हें हिरासत में लेने की तस्वीरें सामने आई हैं। विपक्षी दल इसे लोकतंत्र की गला घोंटने वाली कार्रवाई करार दे रहे हैं, उनका कहना है कि सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए पुलिस तंत्र का खुलकर दुरुपयोग कर रही है। जनता की आवाज को इस तरह से दबाए जाने के कारण पंजाब का राजनीतिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है और आम जनता के बीच सरकार की छवि को लेकर गंभीर चर्चाएं छिड़ चुकी हैं।
सरकारी स्कूलों की बदहाली और शिक्षा क्रांति के दावों की पोल खोलती जमीनी हकीकत
आम आदमी पार्टी की सरकार ने सत्ता में आने से पहले दिल्ली मॉडल की तर्ज पर पंजाब के सरकारी स्कूलों को दुनिया का सबसे बेहतरीन शिक्षा का केंद्र बनाने और शानदार 'शिक्षा क्रांति' लाने के बड़े-बड़े दावे किए थे। लेकिन जमीनी हकीकत इन हसीन विज्ञापनों और दावों से कोसों दूर नजर आ रही है, क्योंकि राज्य के ग्रामीण और सुदूर इलाकों के सरकारी स्कूलों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव बना हुआ है। कई स्कूलों में अध्यापकों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं, बच्चों के बैठने के लिए सही डेस्क नहीं हैं, और छतें टपक रही हैं, जिससे छात्रों का भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा है। जब शिक्षक संघ और अभिभावक अपनी इन जायज मांगों को लेकर शिक्षा विभाग या मंत्रियों के सामने अपनी बात रखते हैं, तो उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिलता। शिक्षा के स्तर में सुधार न होने और विज्ञापनों तथा धरातल के बीच के इस भारी अंतर ने जागरूक नागरिकों और अभिभावकों के भीतर सरकार के खिलाफ एक गहरा रोष पैदा कर दिया है।
आवारा कुत्तों का बढ़ता आतंक और प्रशासनिक उदासीनता से सहमे ग्रामीण व शहरी लोग
पंजाब में राजनीतिक और शैक्षिक मुद्दों के अलावा एक ऐसी समस्या भी तेजी से विकराल रूप धारण कर चुकी है, जो सीधे तौर पर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी हुई है। राज्य के शहरों से लेकर गांवों तक आवारा कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ चुका है कि गलियों में निकलना दूभर हो गया है, और रोजाना बुजुर्गों तथा मासूम बच्चों को काटने की खौफनाक घटनाएं सामने आ रही हैं। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन इस गंभीर समस्या पर काबू पाने के लिए कोई भी ठोस और प्रभावी कदम उठाने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं, जिससे लोगों में स्थानीय निकायों के प्रति भारी गुस्सा है। जब पीड़ित परिवार न्याय या राहत के लिए प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, तो उन्हें केवल टालमटोल रवैया देखने को मिलता है। आवारा पशुओं और कुत्तों के इस बेकाबू आतंक ने यह साबित कर दिया है कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक पकड़ कितनी कमजोर हो चुकी है, और सरकार इस ओर ध्यान देने के बजाय केवल राजनीतिक बयानबाजी में व्यस्त है।
भगवंत मान सरकार के लिए आने वाले दिन साबित हो सकते हैं बड़ी राजनीतिक चुनौती
विपक्ष के तीखे हमलों, जनता के बढ़ते आक्रोश और एक के बाद एक खड़े हो रहे इन तमाम बहुआयामी विवादों के बीच मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने अपनी सरकार की साख बचाने की एक बहुत बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है। पंजाब की जनता ने बदलाव की उम्मीद के साथ एक भारी बहुमत देकर इस सरकार को चुना था, इसलिए लोगों की अपेक्षाएं भी उसी अनुपात में बहुत ज्यादा ऊंची थीं। लेकिन बेरोजगारी, कानून व्यवस्था की सुस्ती, स्कूलों की दुर्दशा और बुनियादी नागरिक समस्याओं के समाधान में हो रही देरी ने जनता के उस भरोसे को धीरे-धीरे डगमगाना शुरू कर दिया है। यदि सरकार ने समय रहते इन सुलगते मुद्दों पर संजीदगी से विचार नहीं किया और सिर्फ लीपापोती करने की कोशिश जारी रखी, तो आने वाले समय में यह असंतोष एक बड़े राजनीतिक भूचाल का रूप ले सकता है, जिसका खामियाजा पार्टी को आगामी राजनीतिक मैदान में भुगतना पड़ सकता है।