UP के 'लड़के' की बिहार में एंट्री, Nitish-Tejashwi का खेल बिगाड़ने की तैयारी?
बिहार का चुनावी मैदान पहले से ही गरम था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश से एक ऐसे खिलाड़ी की एंट्री हुई है जिसने इस पूरे खेल को और भी ज़्यादा दिलचस्प बना दिया है। जी हाँ, आपने बिलकुल सही सुना। समाजवादी पार्टी के मुखिया और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अब बिहार की राजनीति में सीधी दखल देने आ गए हैं।
उनकी यह एंट्री किसी आम दौरे की तरह नहीं, बल्कि एक 'वोटर अधिकार यात्रा' के ज़रिए हुई है। कहने को तो यह यात्रा वोटरों को उनके अधिकारों के प्रति जगाने के लिए है, लेकिन इसके पीछे के राजनीतिक मायने बहुत गहरे हैं।
अचानक बिहार की याद क्यों आई?
यह सवाल हर किसी के मन में है। बिहार में मुख्य मुकाबला एनडीए (नीतीश-बीजेपी) और महागठबंधन (तेजस्वी-कांग्रेस) के बीच माना जा रहा था। ऐसे में अखिलेश यादव का इस लड़ाई में कूदना कई सवाल खड़े करता है। क्या वह किसी तीसरे मोर्चे की नींव रख रहे हैं? या फिर वह सिर्फ अपनी पार्टी का विस्तार करने के लिए ज़मीन तलाश रहे हैं?
किसके लिए बढ़ेगी सबसे ज़्यादा टेंशन?
अखिलेश की इस यात्रा ने बिहार के दोनों बड़े गठबंधनों की नींद उड़ा दी है।
- महागठबंधन के लिए चिंता: राष्ट्रीय स्तर पर अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव 'इंडिया' गठबंधन में साथी हैं, लेकिन राज्यों की राजनीति अक्सर अलग होती है। अखिलेश यादव की पार्टी अगर बिहार में चुनाव लड़ती है, तो वह यकीनन उन्हीं वोटरों को निशाना बनाएगी जो पारंपरिक रूप से लालू यादव की पार्टी RJD को वोट देते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो वह तेजस्वी यादव के 'वोट बैंक में सेंध' लगा सकते हैं, जिससे सबसे ज़्यादा नुकसान महागठबंधन को ही होगा।
- एनडीए के लिए चुनौती: दूसरी तरफ, अखिलेश की यात्रा सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का भी काम करेगी। वह लगातार बेरोज़गारी, महंगाई और सरकार की नाकामियों पर सवाल उठाएंगे, जिससे नीतीश कुमार और बीजेपी के लिए भी एक नई चुनौती खड़ी होगी।
सीधे शब्दों में कहें, तो अखिलेश यादव का बिहार आना सिर्फ एक राजनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह बिहार चुनाव से पहले एक बड़ा 'पावर मूव' है। यह कदम बताता है कि 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव अब सिर्फ दो गठबंधनों की लड़ाई नहीं रहेगा। इसमें कई नए मोड़ आने बाकी हैं, और अखिलेश यादव ने उस सस्पेंस की पहली पटकथा लिख दी है।