बंगाल में मत विभाजन ने बिगाड़ा ममता बनर्जी का खेल, कांग्रेस-लेफ्ट की वजह से TMC को हुआ 36 सीटों का नुकसान
हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की सियासत में एक नया नैरेटिव सेट कर दिया है। इन चुनावों में कांग्रेस भले ही सिर्फ एक राज्य केरल में अपनी सरकार बनाने में सफल रही हो, लेकिन उसने यह साफ कर दिया है कि विपक्षी 'INDIA' गठबंधन के क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए कांग्रेस को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखने को मिला, जहां भाजपा विरोधी वोटों में बिखराव के कारण सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) को करीब तीन दर्जन (36) सीटों का सीधा नुकसान झेलना पड़ा है।
एक दर्जन से अधिक सीटों पर कांग्रेस ने बिगाड़ा खेल, 'नोटा' ने भी बढ़ाई टेंशन
चुनाव परिणामों के बारीक आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ होता है कि एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस ने सीधे तौर पर टीएमसी की हार-जीत तय की है। साल 2021 के चुनाव में इनमें से 10 सीटें टीएमसी के पाले में थीं। लेकिन इस बार, इन सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार को जो वोट मिले, वे बीजेपी और टीएमसी के बीच जीत-हार के अंतर (मार्जिन) से कहीं अधिक थे। इसके अलावा, टीएमसी को करीब 6 सीटों का नुकसान 'नोटा' (NOTA) की वजह से भी हुआ है, जहां कांग्रेस को नोटा से काफी ज्यादा वोट मिले थे।
आपको बता दें कि बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों में से इस बार भाजपा ने 207 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, जबकि टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट गई है। इस चुनाव में कांग्रेस के खाते में 2 और लेफ्ट को 1 सीट मिली है।
मुस्लिम वोटों में सेंधमारी: मालदा-मुर्शिदाबाद में बीजेपी ने गाड़े झंडे
टीएमसी की इस शिकस्त की एक और बड़ी वजह मुस्लिम मतदाताओं का अलग-अलग धड़ों में बंट जाना रहा। मुस्लिम बहुल माने जाने वाले मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर की कुल 43 सीटों में से इस बार बीजेपी ने 20 सीटों पर कब्जा जमा लिया है। इसका कारण यह रहा कि इस बार मुस्लिम मतदाता टीएमसी के अलावा कांग्रेस, लेफ्ट, इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) और हुमायूं कबीर की पार्टी के बीच बंट गए। जबकि साल 2021 के चुनाव में यह वोट बैंक पूरी तरह टीएमसी के साथ एकजुट था, जिसके दम पर टीएमसी को तब 35 और बीजेपी को सिर्फ 8 सीटें मिली थीं।
'ममता बनर्जी पहले समझ लेतीं स्थिति तो नहीं होती ये दुर्दशा'
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में दशकों तक शासन करने वाले लेफ्ट (वामदल) के पास आज भी करीब 7 फीसदी का एक मजबूत कोर वोट बैंक है। जानकारों का कहना है कि चुनाव हारने के बाद 'INDIA' गठबंधन की दुहाई देने वाली पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अगर समय रहते जमीन की हकीकत और वोट शेयर की गणित को समझ लेतीं, तो उन्हें आज सत्ता से बाहर नहीं होना पड़ता। बंगाल में ऐसी कई दर्जन सीटें हैं जहां लेफ्ट और कांग्रेस के सामूहिक वोट टीएमसी की हार के अंतर से काफी ज्यादा हैं।
कांग्रेस की क्षेत्रीय दलों को नसीहत: एकजुटता बिना जीत नहीं है आसान
इस चुनावी उलटफेर के बाद कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने क्षेत्रीय दलों को नसीहत देते हुए कहा है कि अब वक्त आ गया है जब सभी विपक्षी दलों को एक बार फिर नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों को भी इस जमीनी हकीकत को स्वीकार करना होगा। बीजेपी को हराने के लिए लोकसभा के साथ-साथ राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी बेहतर तालमेल और सीटों की सही साझेदारी बेहद जरूरी है।
पहले भी मत विभाजन से बीजेपी को मिला है बड़ा फायदा
विपक्ष में बिखराव के कारण बीजेपी को वॉकओवर मिलने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले साल 2022 के गुजरात और साल 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यही पैटर्न देखा गया था। दिल्ली में कांग्रेस ने करीब एक दर्जन सीटों पर आम आदमी पार्टी (AAP) के हार के अंतर से अधिक वोट हासिल किए थे, जिससे समीकरण बिगड़े। ठीक इसी तरह, गुजरात में आम आदमी पार्टी (AAP) की एंट्री की वजह से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को 39 सीटों का भारी नुकसान हुआ था, क्योंकि उन सीटों पर 'आप' को बीजेपी की जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले थे, जबकि खुद 'आप' सिर्फ 5 सीटें ही जीत सकी थी।