दुनिया हैरान! भारत ने रचा इतिहास: परमाणु ऊर्जा से हाइड्रोजन बनाने वाला दुनिया का पहला प्लांट शुरू
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा और अत्याधुनिक परमाणु प्रौद्योगिकी के वैश्विक मानचित्र पर एक नया और स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, भारत ने परमाणु ऊर्जा से चलने वाले दुनिया के पहले हाइड्रोजन उत्पादन केंद्र (Hydrogen Production Center) का सफलतापूर्वक शुभारंभ कर दिया है। यह उपलब्धि न केवल भारत की 'आत्मनिर्भरता' को दर्शाती है, बल्कि भविष्य के 'कार्बन-मुक्त' दुनिया के निर्माण में हमारी अग्रणी भूमिका को भी सुनिश्चित करती है।
कलपक्कम में रची गई इतिहास की नई इबारत शुक्रवार को चेन्नई के पास कलपक्कम में स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) में इस संयंत्र का भव्य उद्घाटन किया गया। परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के सचिव और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अजीत कुमार मोहंती ने IGCAR के निदेशक श्रीकुमार जी. पिल्लई की गरिमामयी उपस्थिति में इस अत्याधुनिक केंद्र को राष्ट्र को समर्पित किया। यह केंद्र 'टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर' के रूप में कार्य करेगा, जो परमाणु ऊर्जा के जरिए हाइड्रोजन के उत्पादन की व्यवहार्यता को सिद्ध करेगा।
स्वदेशी तकनीक से मिली बड़ी सफलता इस क्रांतिकारी संयंत्र की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), मुंबई द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित 'कॉपर-क्लोरीन थर्मोकेमिकल प्रक्रिया' (Copper-Chlorine Thermochemical Cycle) का उपयोग किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, विश्व भर में हाइड्रोजन बनाने की जितनी भी तकनीकें मौजूद हैं, उनमें कॉपर-क्लोरीन चक्र को सबसे अधिक कुशल माना जाता है। इसकी खूबी इसका कम ऑपरेटिंग तापमान और उच्च थर्मोडायनामिक दक्षता है, जो इसे पारंपरिक तरीकों से कहीं ज्यादा प्रभावी बनाती है।
कैसे खत्म होगा जीवाश्म ईंधन का संकट? अब सवाल यह है कि यह तकनीक भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? दरअसल, इस संयंत्र में फास्ट रिएक्टरों से निकलने वाली न्यूक्लियर हीट (परमाणु ऊष्मा) का उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से कार्बन-मुक्त है, जिसका अर्थ है कि अब हाइड्रोजन उत्पादन के लिए कोयले या अन्य जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता खत्म हो जाएगी। पारंपरिक तरीकों से जो भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता था, यह तकनीक उसे जड़ से मिटाने की क्षमता रखती है। यह न केवल ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद करेगा, बल्कि हाइड्रोजन इकोनॉमी (Hydrogen Economy) के क्षेत्र में भारत को विश्व का 'एक्सपोर्ट हब' बनाने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।