सुप्रीम कोर्ट ने नई जनहित याचिका (PIL) खारिज करते हुए अवमानना (Contempt) याचिका दाखिल करने का सुझाव दिया, ताकि पूर्व आदेश का सही लाभ मिल सके
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय को 14 साल तक के बच्चों को धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के पंजीकरण, निगरानी और नियमन से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने उपाध्याय से कहा कि वे बार-बार नई रिट याचिका दाखिल करके "अपने ही बनाए अच्छे केस को खराब न करें" (Don't spoil a good case)।
मामला क्या है और कोर्ट ने क्या कहा?
अश्विनी उपाध्याय ने अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि देश में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा (जैसे मदरसें, गुरुकुल आदि) देने वाले सभी संस्थानों का सरकार द्वारा अनिवार्य पंजीकरण, मान्यता और नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए।
कोर्ट ने याद दिलाया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही आदेश जारी कर चुका है, जिसमें संबंधित अधिकारियों (शिक्षा मंत्रालय) को उनके प्रतिनिधित्व पर दो महीने के भीतर विचार करने का निर्देश (Writ of Mandamus) दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की सलाह और चेतावनी:
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गलत प्रक्रिया से बचें: जब उपाध्याय ने बताया कि तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी अधिकारियों ने उनके ज्ञापन पर फैसला नहीं लिया है, तो कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसके लिए दोबारा नई रिट याचिका दाखिल करना प्रक्रियात्मक रूप से सही नहीं है।
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अवमानना (Contempt) याचिका का रास्ता: पीठ ने कहा कि यदि सरकार कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कर रही है, तो सही कानूनी रास्ता अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करना है, न कि बार-बार नई रिट याचिका लगाना।
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'Self-Goal' न करें: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने कहा, "आपके पास पहले से ही अपने पक्ष में एक आदेश है। नई याचिका दाखिल कर आप खुद के खिलाफ ही 'सेल-गोल' कर रहे हैं। आप अपने हाथों से बने-बनाए अच्छे केस को खराब मत कीजिए।"
कोर्ट की इस सलाह के बाद वकील अश्विनी उपाध्याय ने अपनी ताजा याचिका वापस ले ली, ताकि वे आदेश का पालन न करने के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई का रास्ता चुन सकें।