कर्नाटक के कावेरी अभयारण्य में 3 तमिलों की मौत पर भड़के तमिलनाडु के CM विजय; बोले- यह बर्बर नरसंहार, वन विभाग का स्पष्टीकरण कतई मंजूर नहीं

कर्नाटक के कावेरी अभयारण्य में 3 तमिलों की मौत पर भड़के तमिलनाडु के CM विजय; बोले- यह बर्बर नरसंहार, वन विभाग का स्पष्टीकरण कतई मंजूर नहीं

कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा से सटे चामराजनगर जिले के हनूर तालुक स्थित कावेरी वन्यजीव अभयारण्य (Cauvery Wildlife Sanctuary) में 15 अगस्त 2026 की तड़के हुई एक कथित गोलीबारी की घटना ने दोनों राज्यों के बीच भारी राजनीतिक और सामाजिक तनाव पैदा कर दिया है। कर्नाटक वन विभाग के कर्मियों द्वारा की गई कथित फायरिंग में तमिल मूल के तीन लोगों—एंथनी सामी, जॉन रोज पीटर और कुमार—की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि महिमा दास नामक चौथा व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया।

कर्नाटक वन विभाग और स्थानीय पुलिस प्रशासन ने दावा किया कि उनकी एंटी-पोचिंग टीम गश्त पर थी, तभी जंगल में अवैध शिकार (Poaching) के इरादे से घुसे कुछ संदिग्धों के साथ आमना-सामना हुआ। वन विभाग का आरोप है कि संदिग्धों के पास अवैध हथियार और हिरण का मांस मौजूद था और दोनों पक्षों के बीच हुई कथित मुठभेड़ व आत्मरक्षा में चलाई गई गोलियों से तीनों की जान गई।

हालांकि, वन विभाग के इस 'एनकाउंटर' और शिकार के नैरेटिव को मृतकों के परिजनों, स्थानीय ग्रामीणों और तमिलनाडु के समूचे राजनीतिक नेतृत्व ने सिरे से खारिज कर दिया है। पीड़ितों के परिजनों का स्पष्ट कहना है कि वे किसी भी तरह के शिकारी नहीं थे, बल्कि सामान्य किसान व चरवाहे थे जो जंगल में अपने भटके हुए मवेशियों की तलाश में गए थे।

तमिलनाडु के CM विजय का कड़ा प्रहार: 'यह बर्बर नरसंहार, वन विभाग का बहाना कतई स्वीकार नहीं'

इस हृदयविदारक घटना पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और 'तमिलगा वेत्री कझगम' (TVK) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर बेहद कड़ा और भावुक बयान जारी किया। सीएम विजय ने इस पूरी घटना को 'अमानवीय नरसंहार' करार देते हुए कर्नाटक वन विभाग के रुख पर गहरी नाराजगी जताई।

मुख्यमंत्री विजय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा:

  • 'दिल दहला देने वाली क्रूरता': "यह जानकर गहरा दुख और आघात हुआ है कि कर्नाटक के चामराजनगर जिले के हनूर तालुक के गांवों में रहने वाले तीन निर्दोष तमिल—एंथनी सामी, जॉन रोज पीटर और कुमार—को 15 अगस्त की सुबह कावेरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी क्षेत्र में वन विभाग के अधिकारियों ने गोलियों से भून दिया। मैं इस क्रूर नरसंहार की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करता हूं।"

  • वन विभाग का स्पष्टीकरण अस्वीकार्य: सीएम विजय ने कहा कि कर्नाटक वन विभाग इस पूरे मामले को दबाने और खुद को बचाने के लिए जो मनगढ़ंत सफाई और शिकार का दावा पेश कर रहा है, वह पूरी तरह अस्वीकार्य और निराधार है।

  • उच्च स्तरीय जांच और सख्त सजा की मांग: विजय ने मांग की कि इस जघन्य घटना की किसी भी निष्पक्ष और उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच समिति (High-Level Inquiry Committee) द्वारा समयबद्ध जांच कराई जाए और गोली चलाने वाले दोषी वन कर्मियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई व सजा सुनिश्चित की जाए।

  • पीड़ित परिवारों को मुआवजा और सुरक्षा: उन्होंने कर्नाटक सरकार से आग्रह किया कि वह बिना किसी देरी के पीड़ित परिवारों को समुचित आर्थिक मुआवजा, सहायता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे, साथ ही यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में सीमावर्ती क्षेत्रों में तमिल नागरिकों के साथ इस प्रकार की अमानवीय घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच गरमाया सीमाई विवाद: स्टालिन, पीएमके और विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं

इस घटना के सामने आते ही तमिलनाडु के तमाम प्रमुख राजनीतिक दलों ने एक सुर में कर्नाटक प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए हैं और इसे मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन बताया है:

  • डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन का हमला: द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने घटना को स्तब्ध करने वाला बताते हुए कहा कि इंसानी जान की कीमत को दरकिनार कर इस तरह गोलियां बरसाना बेहद निंदनीय है। स्टालिन ने आरोप लगाया कि कर्नाटक सरकार अपने दोषी वन कर्मचारियों को बचाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने मांग की कि इस मामले में तत्काल हत्या का मुकदमा (Murder Case FIR) दर्ज किया जाए, न्यायिक जांच बैठाई जाए और पीड़ित परिवारों के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी व पर्याप्त मुआवजा दिया जाए।

  • पीएमके (PMK) नेता अंबुमणि रामदास की सीबीआई जांच की मांग: पट्टाली मक्कल काची के अध्यक्ष डॉ. अंबुमणि रामदास ने घटना की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग उठाई और प्रत्येक पीड़ित परिवार को कम से कम ₹1 करोड़ का विशेष मुआवजा देने की वकालत की।

  • वामपंथी दलों (CPI और CPM) का विरोध: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और माकपा के राज्य नेतृत्व ने बयान जारी कर कहा कि तीनों व्यक्ति निर्दोष किसान थे जो मवेशियों को चराने गए थे। वाम दलों ने दोषी अधिकारियों की तत्काल बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

चामराजनगर और मैसूरु में सड़कों पर उतरा जनाक्रोश: मल्ले महादेश्वरा पहाड़ियों का रास्ता जाम

घटना के बाद कर्नाटक के सीमावर्ती जिले चामराजनगर, हनूर और मैसूरु में भारी जन-आक्रोश फैल गया। रविवार को मृतकों के परिजनों, रिश्तेदारों और स्थानीय ग्रामीणों ने शवों के साथ दत्ताई वन क्षेत्र (Datti Forest Area) और हनूर में जोरदार धरना-प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने प्रसिद्ध तीर्थस्थल मल्ले महादेश्वरा बेट्टा (Male Mahadeshwara Hills) की ओर जाने वाले मुख्य राजमार्ग को घंटों तक जाम कर दिया। ग्रामीणों का गुस्सा इस बात को लेकर था कि वन विभाग के कर्मियों ने बिना किसी चेतावनी या आत्मसमर्पण का मौका दिए सीधे गोलियां क्यों चलाईं। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि गोली चलाने वाले वन अधिकारियों को तुरंत मौके पर लाया जाए और उन्हें निलंबित कर गिरफ्तार किया जाए। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों की पुलिस ने सीमावर्ती इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं।

कर्नाटक सरकार का रुख: मजिस्ट्रेट जांच के आदेश और विपक्ष की न्यायिक जांच की मांग

बढ़ते राजनीतिक दबाव और विरोध-प्रदर्शनों के बीच कर्नाटक सरकार ने मामले की निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है।

  • मजिस्ट्रेट जांच के आदेश: कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि सरकार घटना की तह तक जाने के लिए मजिस्ट्रेट जांच (Magisterial Inquiry) के आदेश दे चुकी है और जांच रिपोर्ट के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उचित सहायता का आश्वासन भी दिया।

  • कर्नाटक में विपक्षी बीजेपी की प्रतिक्रिया: कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने पूरे मामले की न्यायिक जांच (Judicial Probe) की मांग करते हुए कहा कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वन क्षेत्र में गोलीबारी की ऐसी घटना बेहद गंभीर है और दूध का दूध व पानी का पानी करने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है।

मानवाधिकार, वन कानून और अंतरराज्यीय शांति पर गंभीर सवाल

कावेरी अभयारण्य की इस घटना ने एक बार फिर वन संरक्षण कानूनों और मानवाधिकारों के बीच के नाजुक संतुलन को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अनधिकृत रूप से संरक्षित वन क्षेत्र में प्रवेश भी करता है, तो भी वन सुरक्षा बलों को सीधे जानलेवा फायरिंग करने का अनियंत्रित अधिकार नहीं है; प्रक्रिया के तहत पहले चेतावनी देना, हवाई फायरिंग करना या गैर-घातक बल का प्रयोग करना अनिवार्य होता है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय द्वारा उठाए गए सख्त कदमों और विपक्षी दलों की मुखरता ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। अब सभी की नजरें मजिस्ट्रेट जांच और फॉरेंसिक रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो सके कि 15 अगस्त की सुबह जंगल की उस तराई में वास्तव में क्या हुआ था और क्या निर्दोष ग्रामीणों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया गया था।

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