सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता फैसले लागू करने में देरी पर केंद्र को फटकारा
देश की न्याय व्यवस्था और व्यापारिक सुगमता (Ease of Doing Business) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक बेहद गंभीर मामले में जबरदस्त फटकार लगाई है। सर्वोच्च अदालत ने मध्यस्थता (Arbitration) और पंचाट के फैसलों को लागू करने में हो रही अत्यधिक और अनावश्यक देरी पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कड़े शब्दों में कहा कि यदि व्यवस्था इसी तरह सुस्त बनी रही और समय पर फैसले लागू नहीं हुए, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को बड़ा धक्का लगेगा और कोई भी विदेशी या घरेलू निवेशक देश की व्यवस्था पर भरोसा नहीं करेगा। कोर्ट ने दो टूक अंदाज में सरकार को चेतावनी देते हुए यहां तक कह दिया कि इस मामले में सरकारी तंत्र और नीतियां पूरी तरह से विफल साबित हुई हैं।
मध्यस्थता फैसलों के क्रियान्वयन में देरी पर सुप्रीम कोर्ट का फूटा गुस्सा
भारत को एक वैश्विक निवेश गंतव्य (Global Investment Destination) के रूप में स्थापित करने के सरकार के दावों के बीच सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी प्रशासनिक मशीनरी की पोल खोलने के लिए काफी है। अदालत के समक्ष एक ऐसे मामले पर सुनवाई चल रही थी, जहां वर्षों पहले मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitration Tribunal) द्वारा दिए गए फैसलों और अवार्ड्स को आज तक लागू नहीं कराया जा सका है। इस लंबी कानूनी खींचतान और नौकरशाही के लालफीताशाही रवैये से आहत होकर शीर्ष अदालत ने सरकार को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक मध्यस्थता के फैसलों का त्वरित और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक कानून के शासन का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता।
'कोई भी आप पर भरोसा नहीं करेगा': निवेशकों के विश्वास पर उठे गंभीर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि विदेशी निवेशक या कॉरपोरेट घराने भारत में अपने व्यापारिक विवादों के समाधान के लिए तभी आगे आएंगे जब उन्हें यह विश्वास होगा कि मध्यस्थता के फैसले निष्पक्ष और समय पर लागू किए जाएंगे। यदि अदालत के आदेशों या मध्यस्थता पंचाट के फैसलों को लागू करवाने के लिए लोगों को दशकों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ेंगे, तो देश में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का दावा महज कागजी साबित होकर रह जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निवेशकों का भरोसा जीतना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन इस मोर्चे पर सरकारी नीतियां और तंत्र पूरी तरह से नाकामयाब रहे हैं।
नौकरशाही की सुस्ती और अदालती पेंडेंसी पर लगाम लगाने की सख्त जरूरत
न्यायालय ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि केंद्र और राज्य सरकारों के कई विभाग खुद मध्यस्थता फैसलों के खिलाफ बार-बार अपील दायर करते हैं या फिर जानबूझकर मामलों को लटकाए रखते हैं। इस अवांछित मुकदमेबाजी (Litigation) के कारण सरकारी खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है और अदालतों में मुल्तवी की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब करते हुए कहा है कि इस व्यवस्था को सुधारने के लिए तत्काल प्रभाव से एक ठोस, पारदर्शी और समयबद्ध एक्शन प्लान तैयार किया जाए, ताकि पंचाट के फैसलों को लागू करने में होने वाली मनमानी देरी पर हमेशा के लिए अंकुश लगाया जा सके।
सुधार की सख्त दरकार और भविष्य की राह
सर्वोच्च न्यायालय की यह कड़ी फटकार प्रशासनिक सुधार और न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा संदेश है। देश के आर्थिक विकास और वाणिज्यिक विवादों के त्वरित निपटारे के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि मध्यस्थता अधिनियम (Arbitration Act) के प्रावधानों का कड़ाई से पालन हो। यदि सरकार समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाती है, तो देश की न्यायिक और आर्थिक साख पर विपरीत प्रभाव पड़ना तय है। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद केंद्र सरकार इस व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए क्या और कितनी जल्दी प्रभावी कदम उठाती है।