Supreme Court on ITR & EPFO Data Access: क्या प्राइवेट कंपनियां देख सकती हैं आपका टैक्स और पीएफ डेटा? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

Supreme Court on ITR & EPFO Data Access: क्या प्राइवेट कंपनियां देख सकती हैं आपका टैक्स और पीएफ डेटा? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

देश भर में नौकरीपेशा कर्मचारियों और करदाताओं के मन में अक्सर यह चिंता बनी रहती है कि क्या कोई निजी कंपनी, बैंक या बैकग्राउंड वेरिफिकेशन (Background Verification) एजेंसी उनकी बिना स्पष्ट सहमति के उनके इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के गोपनीय रिकॉर्ड तक पहुंच सकती है? हाल ही में यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के संवेदनशील रोजगार और वित्तीय डेटा के कथित दुरुपयोग और निजी कंपनियों द्वारा इसके व्यावसायिक इस्तेमाल (Commercial Exploitation) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों को इस मामले की तकनीकी जांच करने और सुरक्षात्मक उपाय यानी 'एंटीडोट' तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दायर हुई थी याचिका और क्या हैं आरोप?

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL - पीयूष छाबड़ा बनाम भारत संघ) में दावा किया गया था कि देश में बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और वित्तीय जांच करने वाली कुछ निजी संस्थाओं का एक ऐसा तकनीकी इकोसिस्टम विकसित हो गया है, जो नागरिकों के यूएएन (UAN), पैन (PAN), ईपीएफओ पासबुक और इनकम टैक्स रिकॉर्ड्स (Form 26AS, AIS) तक पहुंच बना रहा है।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि:

  • कुछ निजी एजेंसियां खुले तौर पर विज्ञापन देकर पैसों के बदले किसी भी कर्मचारी की रोजगार हिस्ट्री, पीएफ पासबुक विवरण और टैक्स रिटर्न की जानकारी निकालने का दावा कर रही हैं।

  • कर्मचारियों से बिना उचित ओटीपी (OTP) या वैध सहमति के यह डेटा कथित रूप से हासिल किया जा रहा है।

  • नागरिकों द्वारा सरकार को वैधानिक उद्देश्यों (टैक्स और पीएफ) के लिए सौंपा गया संवेदनशील डेटा निजी बाज़ार में बेचा जा रहा है, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मौलिक अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? 4 महीने में एक्शन लेने का निर्देश

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए:

  • डेटा लीक या खुली छूट का फैसला नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अदालत ने अभी किसी विशिष्ट कंपनी को अवैध डेटा एक्सेस का दोषी घोषित नहीं किया है और न ही यह माना है कि कोई बड़ा डेटा ब्रीच हुआ है।

  • एंटीडोट (समाधान) तैयार करने के निर्देश: शीर्ष अदालत ने सरकार से कहा कि वह साइबर और डोमेन विशेषज्ञों की मदद से इस पूरी व्यवस्था की तकनीकी जांच करे और यदि कहीं सुरक्षा में कोई खामी (Loophole) है, तो उसका तत्काल तोड़ या एंटीडोट तैयार करे।

  • समयसीमा तय: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को याचिकाकर्ता के ज्ञापनों पर गंभीरता से विचार करते हुए 4 महीने के भीतर आवश्यक नीतिगत और कानूनी कदम उठाने को कहा है।

क्या वास्तव में कोई प्राइवेट कंपनी आपका ITR या EPFO डेटा सीधे देख सकती है?

सरकारी और तकनीकी नियमों के अनुसार, भारत सरकार के इनकम टैक्स पोर्टल और ईपीएफओ के डेटाबेस अत्यधिक सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड होते हैं।

  • सीधी पहुंच की अनुमति नहीं: कोई भी निजी कंपनी केवल आपका पैन कार्ड नंबर या यूएएन नंबर जानकर सीधे आपके आईटीआर फॉर्म या पीएफ पासबुक को डाउनलोड नहीं कर सकती।

  • सहमति आधारित एपीआई (Consent-Based API): बैंक या अधिकृत वित्तीय संस्थान जब लोन या क्रेडिट कार्ड प्रोसेस करते हैं, तो वे अकाउंट एग्रीगेटर (Account Aggregator) या ऑथेंटिकेशन फ्रेमवर्क के जरिए ग्राहक से ओटीपी आधारित स्पष्ट सहमति लेते हैं।

  • विवाद की मुख्य जड़: कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या कुछ थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन कंपनियां किसी पिछले दरवाजे (Backdoor), मध्यस्थों (Intermediaries) या रीक्रूटर्स के लॉग-इन क्रेडेंशियल्स का दुरुपयोग करके अनाधिकृत तरीके से इस संवेदनशील डेटा को एक्सेस कर रही हैं।

डेटा प्रोटेक्शन कानून (DPDP Act) और कर्मचारियों के अधिकार

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) के तहत किसी भी नागरिक के वित्तीय और व्यक्तिगत डेटा को बिना उसकी वैध, स्पष्ट और उद्देश्य-आधारित सहमति (Informed Consent) के प्रोसेस करना, ट्रांसफर करना या व्यावसायिक रूप से बेचना गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध है।

सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब इलेक्ट्रॉनिक्स व आईटी मंत्रालय (MeitY), आयकर विभाग और ईपीएफओ इस बात की ऑडिट करेंगे कि सरकारी डेटाबेस के एपीआई (APIs) और वेरिफिकेशन पोर्टल्स पर कोई अनधिकृत फेचिंग तो नहीं हो रही है। सरकार के आगामी 4 महीनों के जवाब के बाद ही यह पूरी तरह साफ हो पाएगा कि इस तकनीकी सुरक्षा ढांचे को और कितना कड़ा बनाया जाएगा।

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