विदेशी फंडिंग पर सिर्फ भारत ही नहीं, अमेरिका से लेकर यूरोप तक लागू हैं कड़े कानून; जानिए अमेरिकी FARA से भारतीय FCRA कितना अलग और क्यों वैश्विक सुरक्षा के लिए जरूरी!

विदेशी फंडिंग पर सिर्फ भारत ही नहीं, अमेरिका से लेकर यूरोप तक लागू हैं कड़े कानून; जानिए अमेरिकी FARA से भारतीय FCRA कितना अलग और क्यों वैश्विक सुरक्षा के लिए जरूरी!

जब भी भारत में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए (FCRA) की कड़ाई या संशोधनों की बात आती है, तो अक्सर यह बहस छिड़ जाती है कि क्या गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और नागरिक समाज पर कसता शिकंजा केवल भारत की विशेषता है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो यह धारणा पूरी तरह गलत साबित होती है। दुनिया के सबसे बड़े और पुराने लोकतंत्रों—जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय संघ के देशों में विदेशी धन, गुप्त फंडिंग और विदेशी प्रभाव (Foreign Influence) को नियंत्रित करने के लिए बेहद सख्त कानूनी ढांचा पहले से लागू है। राष्ट्रीय संप्रभुता, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की सुरक्षा और आंतरिक शांति को बाहरी हस्तक्षेप से बचाना हर एक संप्रभु राष्ट्र का संवैधानिक अधिकार और प्राथमिकता है।

अमेरिका का FARA कानून: 1938 से लागू है विदेशी प्रभाव पर कड़ा पहरा

अक्सर यह माना जाता है कि पश्चिमी देशों में विदेशों से पैसा प्राप्त करने पर कोई पाबंदी नहीं है, लेकिन अमेरिका का 'फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट' (FARA) इसका सबसे बड़ा खंडन है। अमेरिका ने 1938 में ही नाजी दुष्प्रचार और बाहरी राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए FARA लागू किया था। इस कानून के तहत यदि कोई भी व्यक्ति, एनजीओ, थिंक टैंक, जनसंपर्क (PR) एजेंसी या मीडिया संस्थान किसी विदेशी सरकार, विदेशी राजनीतिक दल या विदेशी संस्था के निर्देश या वित्तपोषण (Funding) पर काम करता है, तो उसे अमेरिकी गृह मंत्रालय (Department of Justice) के पास खुद को 'फॉरेन एजेंट' (विदेशी एजेंट) के रूप में पंजीकृत कराना अनिवार्य है। FARA के तहत विदेशी फंडिंग, अनुबंधों (Contracts) और बैठकों का पूरा पारदर्शी ब्योरा सार्वजनिक करना होता है। ऐसा न करने या झूठी जानकारी देने पर अमेरिका में भारी जुर्माने के साथ-साथ कई सालों की जेल की सजा का कड़ा प्रावधान है।

यूरोप, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में भी विदेशी चंदे पर कसे गए शिकंजे

केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि यूरोप और अन्य विकसित लोकतंत्रों ने भी पिछले कुछ वर्षों में अपने विदेशी प्रभाव कानूनों को अत्यधिक मजबूत किया है। ब्रिटेन (UK) ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत 'फॉरेन इन्फ्लुएंस रजिस्ट्रेशन स्कीम' (FIRS) लागू की है, ताकि विदेशी शक्तियों द्वारा ब्रिटेन की नीति-निर्माण प्रक्रिया में पर्दे के पीछे से किए जाने वाले हस्तक्षेप पर रोक लगाई जा सके। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में 'फॉरेन इन्फ्लुएंस ट्रांसपेरेंसी स्कीम' (FITS) पारित की थी, जिसके तहत ऑस्ट्रेलियाई राजनीति और सार्वजनिक नीति को प्रभावित करने वाले विदेशी फंडेड नेटवर्क को उजागर करना अनिवार्य कर दिया गया है। कनाडा में 'फिटा' (FITAA) तथा यूरोपीय संघ में 'विदेशी प्रभाव पारदर्शिता निर्देश' जैसे कानून यह स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशी धन के छिपे हुए एजेंडे से अपनी संप्रभुता की रक्षा करना एक वैश्विक मानक बन चुका है।

भारत का FCRA: उद्देश्य, दायरा और मुख्य नियामक प्रावधान

भारत में विदेशी अंशदान को नियंत्रित करने के लिए गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट' (FCRA) संचालित किया जाता है, जो पहली बार 1976 में बना था और 2010, 2020 तथा हालिया संशोधनों के जरिए इसे और अधिक पारदर्शी बनाया गया है। एफसीआरए का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशों से आने वाला पैसा भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या लोकतांत्रिक चुनावों पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले। भारत का कानून जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों, पत्रकारों, जजों और सरकारी कर्मचारियों को सीधे विदेशी चंदा लेने से प्रतिबंधित करता है। वहीं, सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और धर्मार्थ कार्यों के लिए एनजीओ को गृह मंत्रालय में पंजीकरण कराने या पूर्व अनुमति लेने के बाद ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की नई दिल्ली मुख्य शाखा के एकल खाता प्रणाली के माध्यम से धन प्राप्त करने की अनुमति मिलती है। इसके अलावा, एफसीआरए में प्रशासनिक खर्चों की सीमा 20% तय की गई है और प्राप्त फंड को किसी अन्य संस्था को ट्रांसफर (Sub-granting) करने पर पूर्ण रोक है ताकि पैसे की ट्रेल (Traceability) बनी रहे।

FCRA बनाम FARA: दोनों कानूनों में क्या है बुनियादी और वैचारिक अंतर?

हालांकि भारत का FCRA और अमेरिका का FARA दोनों ही विदेशी धन और प्रभाव पर नजर रखते हैं, लेकिन दोनों की कार्यप्रणाली और दर्शन में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं:

  • फोकस और दायरा: अमेरिकी FARA कानून मुख्य रूप से राजनीतिक लॉबिंग, एडवोकेसी और विदेशी सरकारों के एजेंट के रूप में काम करने वाली संस्थाओं पर केंद्रित है। वहीं, भारत का FCRA मुख्य रूप से नागरिक समाज (NGOs, ट्रस्ट और सोसायटियों) द्वारा प्राप्त किए जाने वाले समग्र वित्तीय प्रवाह (Financial Inflow) को विनियमित करता है।

  • पंजीकरण प्रक्रिया: FARA में किसी संस्था को विदेशी फंड से काम शुरू करने या राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने के बाद 'फॉरेन एजेंट' के रूप में पंजीकरण कराना होता है। इसके विपरीत, भारत के FCRA में विदेशी चंदा बैंक खाते में आने से पहले ही गृह मंत्रालय से पूर्व-पंजीकरण या पूर्व-अनुमति लेना अनिवार्य है।

  • वित्तीय अनुशासन और ऑडिट: FCRA में प्राप्त विदेशी धन के खर्च का ऑडिट, 20% की प्रशासनिक सीमा और एक निश्चित बैंक खाते के जरिए लेन-देन का कड़ा नियम है, जबकि FARA में मुख्य जोर वित्तीय पारदर्शिता और अनुबंधों के प्रकटीकरण (Disclosures) पर रहता है न कि खर्च की सीमाओं पर।

राष्ट्रीय संप्रभुता और पारदर्शिता: क्यों वैश्विक जरूरत बन गए हैं ये कानून?

आधुनिक भू-राजनीतिक परिदृश्य (Geopolitics) में यह कई बार देखा गया है कि विदेशी धन का इस्तेमाल सीधे युद्ध लड़ने के बजाय किसी देश में आंतरिक अस्थिरता पैदा करने, विकास परियोजनाओं (जैसे पावर प्लांट, हाईवे या माइन्स) को पर्यावरणीय बहकावे में रुकवाने, या चुनावों और जनमत को प्रभावित करने के लिए 'सॉफ्ट वेपन' (Soft Weapon) की तरह किया जाता है। यही कारण है कि वाशिंगटन से लेकर लंदन और नई दिल्ली तक, कोई भी लोकतांत्रिक सरकार विदेशी पैसे के बिना हिसाब-किताब के प्रवाह की अनुमति नहीं दे सकती। भारत का FCRA या अमेरिका का FARA किसी वैध मानवीय मदद या धर्मार्थ कार्य पर रोक नहीं लगाते हैं, बल्कि वे केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि जो पैसा देश के भीतर आ रहा है, उसका स्रोत वैध हो, उसका उद्देश्य पारदर्शी हो और वह देश के संविधान और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ न हो।

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