PoK में चल रहे आंदोलन पर रिटायर्ड मेजर का बड़ा और चौंकाने वाला बयान
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में इन दिनों चल रहे तीव्र जनांदोलन, विरोध प्रदर्शनों और वहां के स्थानीय नागरिकों के गुस्से को लेकर भारतीय सामरिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। इस बीच, एक जाने-माने रिटायर्ड सैन्य अधिकारी और रक्षा विशेषज्ञ ने PoK के मौजूदा घटनाक्रम पर एक बेहद तीखा, स्पष्ट और चौंकाने वाला बयान दिया है, जिसने पूरे राजनीतिक और रणनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी है। रिटायर्ड मेजर ने वहां की जनता के संघर्ष को लेकर चेतावनी जारी करते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वहां के आंदोलनकारी या स्थानीय लोग भले ही पाकिस्तान के खिलाफ सड़कों पर उतरे हों, लेकिन अंततः वे सभी कट्टरपंथी हैं और मुश्किल वक्त आने पर पाकिस्तान का ही साथ देंगे। उनके इस विचार ने भारत की सुरक्षा नीति और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या भारत को PoK के इस आंदोलन को आँख मूंदकर समर्थन देना चाहिए या फिर बेहद सावधानी बरतनी चाहिए।
PoK में सुलगती चिंगारी और स्थानीय जनता के भारी आक्रोश की जमीनी हकीकत
पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के मुजफ्फराबाद, मीरपुर, रावलकोट और गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे प्रमुख इलाकों में भारी महंगाई, बिजली और पानी की भारी किल्लत, बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी और पाकिस्तानी हुक्मरानों द्वारा किए जा रहे आर्थिक व राजनीतिक शोषण के खिलाफ आम जनता सड़कों पर उतरी हुई है। लोग खुलेआम पाकिस्तान विरोधी नारे लगा रहे हैं और पाकिस्तानी शासन के दमनकारी रवैये के खिलाफ उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। इन तमाम तस्वीरों और वीडियो को देखकर भारत के कई विश्लेषकों और आम लोगों के मन में यह सहानुभूति या उम्मीद जगती है कि शायद यह क्षेत्र पाकिस्तान से आजाद होने की ओर बढ़ रहा है या भारत के साथ जुड़ने की कोई संभावना बन रही है। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए भारतीय सेना के अनुभवी और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने जमीनी सच्चाइयों से पर्दा उठाना शुरू कर दिया है और यह साफ कर दिया है कि सतह पर दिखने वाला असंतोष पूरी तरह से भारत समर्थक नहीं है।
रिटायर्ड मेजर की बड़ी चेतावनी: वैचारिक कट्टरता और भारत विरोधी मानसिकता से सावधान
भारतीय सेना के इस रिटायर्ड मेजर ने अपने कड़े बयान में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि PoK की भौगोलिक सरहदें और वहां की राजनीतिक फिजा दशकों से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और कट्टरपंथी संगठनों की प्रयोगशाला रही है। भले ही आज वहां के युवा और नागरिक बढ़े हुए बिजली बिलों, टैक्स के बोझ और प्रशासनिक कुप्रबंधन के खिलाफ रोष व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन उनकी वैचारिक परवरिश और धार्मिक-राजनीतिक ताना-बाना पूरी तरह से भारत विरोधी और कट्टरपंथी विचारधारा से ओत-प्रोत रहा है। अधिकारी का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी भी परिस्थिति में भारत या किसी अन्य बाहरी कारक के खिलाफ कोई बड़ा वैचारिक संघर्ष छिड़ता है, तो इन स्थानीय आंदोलनों से जुड़े लोग अंततः अपनी धार्मिक और वैचारिक पहचान के चलते पाकिस्तान के साथ ही खड़े नजर आएंगे। यही कारण है कि भारत की सामरिक और कूटनीतिक एजेंसियों को PoK के इन प्रदर्शनों का आकलन करते समय अत्यधिक परिपक्वता, सतर्कता और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने की सख्त जरूरत है।