राज्यसभा और एमएलसी चुनाव का ऐलान: बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र में 23 अक्टूबर को होगा मतदान
देश के चार प्रमुख राज्यों में राजनीतिक हलचल एक बार फिर अपने चरम पर पहुंचने वाली है। भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India) ने देश के चार महत्वपूर्ण राज्यों—बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में खाली होने वाली राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) की सीटों के लिए आधिकारिक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। इन चुनावों के ऐलान के साथ ही राजनीतिक दलों में सुगबुगाहट तेज हो गई है क्योंकि संसद के उच्च सदन और राज्य के विधान मंडलों में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सभी दल पूरी ताकत झोंकने को तैयार हैं। इन चुनावों के जरिए देश के सियासी गलियारों में नए समीकरण बनने की उम्मीद है, आइए जानते हैं इस पूरे चुनावी शेड्यूल और सीटों के गणित से जुड़ी हर एक महत्वपूर्ण बात को विस्तार से।
चुनाव आयोग की ओर से जारी आधिकारिक शेड्यूल के अनुसार, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की रिक्त सीटों के लिए आगामी 23 अक्टूबर को मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। मतदान के तुरंत बाद उसी दिन यानी 23 अक्टूबर को ही वोटों की गिनती (Counting of Votes) भी संपन्न होने की पूरी संभावना है, हालांकि आधिकारिक परिणामों की अंतिम घोषणा और पूरी प्रक्रिया 27 अक्टूबर तक समाप्त कर ली जाएगी। चुनाव आयोग के इस त्वरित और चुस्त कार्यक्रम ने सभी राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के चयन और जोड़-तोड़ की रणनीति पर तेजी से काम करने के लिए मजबूर कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजे आने वाले समय में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डालेंगे।
इस चुनावी रण में जिन चार राज्यों—बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश—को शामिल किया गया है, वे भारतीय राजनीति के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक माने जाते हैं। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य हैं, जहां विधानसभा और विधान परिषद के आंकड़े सत्ता संतुलन को तय करते हैं। वहीं बिहार और कर्नाटक में भी क्षेत्रीय क्षत्रपों और राष्ट्रीय दलों के बीच वर्चस्व की एक अलग ही जंग देखने को मिलती है। इन राज्यों में राज्यसभा और एमएलसी की सीटों के खाली होने के पीछे का कार्यकाल पूरा होना या अन्य कारणों से रिक्त होना है। विभिन्न दलों के दिग्गजों का राजनीतिक भविष्य इन सीटों के परिणामों पर टिका हुआ है, जिसके चलते सभी दलों ने अभी से अपनी कमर कस ली है।
चुनाव आयोग द्वारा तारीखों के ऐलान के बाद से ही दिल्ली से लेकर लखनऊ, पटना, मुंबई और बेंगलुरु तक सियासी पारा चढ़ गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही खेमे अपने-अपने कोटे के सुरक्षित उम्मीदवारों के नाम तय करने के लिए मंथन बैठकों में जुट गए हैं। संख्या बल (Number Game) के गणित को साधने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियां भी अपने विधायकों को एकजुट करने और क्रॉस-वोटिंग के खतरे को टालने की रणनीति बना रही हैं। जानकारों का कहना है कि इन चुनावों में निर्विरोध निर्वाचन की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं, लेकिन यदि विपक्ष ने अपने उम्मीदवार उतारे, तो मुकाबला काफी दिलचस्प और कांटे की टक्कर का हो सकता है।
राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदनों का महत्व कानून निर्माण और देश-राज्य की नीतियों पर वैचारिक मंथन के लिहाज से बहुत अधिक होता है। संसद और विधानसभाओं में बहुमत का आंकड़ा सुदृढ़ करने के लिए यह चुनाव सभी दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विधान परिषद की सीटों का होना सरकार के नीतिगत फैसलों को पास कराने में अहम भूमिका निभाता है। जैसे-जैसे 23 अक्टूबर की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंचती जा रही है और हर किसी की नजरें इन चुनावों के परिणामों पर टिकी हुई हैं कि किस पार्टी के पाले में कितनी सीटें जाती हैं।