पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा फैसला: अब फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई, जानिए युवाओं को कैसे मिलेगा न्याय

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा फैसला: अब फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई, जानिए युवाओं को कैसे मिलेगा न्याय

अब परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक करने वालों की खैर नहीं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ा ऐलान किया है। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया है कि पेपर लीक मामलों के दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए अब 'फास्ट ट्रैक कोर्ट' (Fast Track Court) का गठन किया जाएगा। इस ऐतिहासिक फैसले से लाखों छात्रों में उम्मीद की नई किरण जगी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फास्ट ट्रैक कोर्ट आखिर काम कैसे करती है और इससे न्याय कितनी जल्दी मिलेगा? आइए एक रिपोर्टर के नजरिए से इसकी पूरी प्रक्रिया को गहराई से समझते हैं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या है और भारत में कब हुई शुरुआत?

देश में जब भी कोई गंभीर या जघन्य अपराध होता है, तो त्वरित न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाता है। आसान भाषा में कहें तो फास्ट ट्रैक कोर्ट वो अदालत है, जहां मुकदमों की सुनवाई तय समय-सीमा के भीतर दिन-प्रतिदिन के आधार पर की जाती है। भारत में सबसे पहले साल 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर इन अदालतों की शुरुआत हुई थी ताकि जिला और निचली अदालतों में सालों से अटके मुकदमों का तुरंत निपटारा किया जा सके। 2012 के निर्भया कांड के बाद भी दिल्ली समेत देश भर में महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों के लिए ऐसी विशेष अदालतें बनाई गई थीं।

पेपर लीक मामलों में क्यों पड़ी फास्ट ट्रैक अदालतों की जरूरत?

सामान्य अदालतों में किसी भी केस की सुनवाई और फैसला आने में सालों लग जाते हैं, जिसका फायदा अक्सर अपराधी उठा लेते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सामान्य कोर्ट में मुकदमों के निपटारे की दर जहां औसतन 3.26 केस प्रति माह होती है, वहीं फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में यह दर लगभग 9.51 केस प्रति माह है। यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट में सामान्य अदालतों से लगभग तीन गुना ज्यादा तेजी से फैसले आते हैं। पीएम मोदी के इस कदम का मकसद यही है कि पेपर लीक के मास्टरमाइंड कानूनी दांव-पेच का फायदा न उठा पाएं और उन पर तुरंत नकेल कसी जा सके।

देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट का नेटवर्क और स्थानीय आंकड़े

केंद्र सरकार ने 2019 में 'फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना' (FTSC) के तहत 1,023 विशेष अदालतें बनाने की मंजूरी दी थी, जिसके लिए 1,952.23 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 725 फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रही हैं, जिनमें 3.34 लाख से भी ज्यादा मामलों का निपटारा किया जा चुका है।

अगर राज्यों के हिसाब से देखें, तो सबसे ज्यादा 218 फास्ट ट्रैक कोर्ट अकेले उत्तर प्रदेश (UP) में कार्यरत हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश में 67 और केरल में 55 अदालतें काम कर रही हैं। अब इन अदालतों के दायरे में पेपर लीक जैसे मामलों को लाने से देश के करोड़ों नौजवानों का न्याय प्रणाली पर भरोसा और भी अटूट होगा।

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