SCO समिट के दौरान व्लादिमीर पुतिन से द्विपक्षीय वार्ता करेंगे पीएम मोदी, मेजबानी से पहले शी जिनपिंग से भी होगी अहम मुलाकात
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती रणनीतिक ताकत का एक और बड़ा और शानदार अध्याय जुड़ने जा रहा है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के आगामी शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक होने वाली है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। इस उच्च स्तरीय कूटनीतिक संवाद के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेता आपसी रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई और वैश्विक व्यापारिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही, भारत द्वारा आगामी महीनों में आयोजित होने वाली एक बड़ी बहुपक्षीय कूटनीतिक मेजबानी से पहले प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी होने की पूरी संभावना है, जो एशिया और दुनिया की भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा भूचाल लाने का माद्दा रखती है। भारत की यह संतुलित और मजूबत विदेश नीति इस बात का प्रमाण है कि नई दिल्ली आज वैश्विक पटल पर हर बड़ी महाशक्ति के साथ स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर बात करने की कुवत रखती है।
SCO शिखर सम्मेलन का महत्व और भारत की कूटनीतिक स्थिति
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) यूरेशियाई क्षेत्र का एक बहुत ही प्रभावशाली राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है, जिसमें भारत की भूमिका लगातार केंद्रीय होती जा रही है। वर्तमान भू-राजनीतिक हालात में जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटती हुई नजर आ रही है, तब भारत की कूटनीति का यह सबसे बड़ा कौशल है कि वह पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को मजबूत रखते हुए रूस और अन्य यूरेशियाई देशों के साथ भी अपने पारंपरिक और अटूट संबंधों को पूरी गर्मजोशी से निभा रहा है। आगामी एससीओ समिट के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर से वैश्विक शांति, बहुपक्षीय सुरक्षा और आतंकवाद के खात्मे के लिए भारत का कड़ा और स्पष्ट रुख दुनिया के सामने रखेंगे। इस सम्मेलन के दौरान होने वाली द्विपक्षीय बैठकें इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता में एक मुख्य मध्यस्थ और शांति के पैरोकार की भूमिका निभा रहा है।
पुतिन और मोदी की द्विपक्षीय वार्ता से क्या हैं उम्मीदें?
भारत और रूस के रिश्ते दशकों से कसौटी पर खरे उतरते आए हैं और दुनिया की तमाम बड़ी उथल-पुथल के बावजूद दोनों देशों की दोस्ती पर कभी कोई आंच नहीं आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली यह आमने-सामने की द्विपक्षीय बातचीत दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को नई ऊंचाइयां देने का काम करेगी। अमेरिका और पश्चिमी देशों के भारी-भरकम प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, जिस पर इस बैठक में आगे की रणनीतिक रूपरेखा तय की जाएगी। इसके अलावा, रक्षा क्षेत्र में तकनीकी हस्तांतरण (Technology Transfer) और अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों के संयुक्त उत्पादन को लेकर भी दोनों नेताओं के बीच बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। पुतिन और मोदी की यह मुलाकात यह साबित करने के लिए काफी है कि भारत और रूस का रिश्ता किसी भी बाहरी दबाव या अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समीकरणों से परे एक मजबूत नींव पर टिका हुआ है।
भारत की बड़ी मेजबानी से पहले शी जिनपिंग से मुलाकात के मायने
इस पूरी कूटनीतिक यात्रा का सबसे रोमांचक और रणनीतिक रूप से संवेदनशील हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली संभावित मुलाकात है। भारत जल्द ही एक बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है, और उससे ठीक पहले दुनिया के इन दो सबसे बड़े एशियाई देशों के शीर्ष नेतृत्व का आमने-सामने आना क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे तनाव के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति बहाल करने की दिशा में यह बैठक एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। भारत ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि चीन के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध तभी सामान्य हो सकते हैं जब सीमा पर पूरी तरह से अमन-चैन और संप्रभुता का सम्मान हो। शी जिनपिंग के साथ होने वाली इस हाई-प्रोफाइल बातचीत में क्षेत्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापारिक बाधाओं को दूर करने पर गंभीर मंथन होने की पूरी उम्मीद है।
वैश्विक मंच पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का डंका
आज की तारीख में भारत की विदेश नीति पूरी तरह से रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के सिद्धांतों पर आधारित है, जहां नई दिल्ली किसी के दबाव में काम करने के बजाय अपने 140 करोड़ देशवासियों के हितों को सर्वोपरि रखती है। एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी रूस के साथ अपनी पुरानी और भरोसेमंद दोस्ती को और मजबूत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे चीन और अन्य एशियाई देशों के साथ कूटनीतिक संवाद के जरिए हर विवाद का शांतिपूर्ण समाधान खोजने का रास्ता भी खुला रख रहे हैं। दुनिया के तमाम बड़े देश आज इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि बिना भारत की सहमति और सहयोग के दक्षिण एशिया या यूरेशिया में किसी भी बड़े भू-राजनीतिक फैसले को अमली जामा नहीं पहनाया जा सकता। एससीओ समिट के दौरान होने वाली ये तमाम बैठकें एक बार फिर से यह साबित कर देंगी कि भारत वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ चुका है और देश का नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश का सिर गर्व से ऊंचा कर रहा है।