NHAI Projects Under Scanner: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर AI-MC तकनीक में हेरफेर का खुलासा, ठेकेदारों की भूमिका पर जांच शुरू
देश के बुनियादी ढांचे और परिवहन व्यवस्था को आधुनिक और उच्च गुणवत्ता वाला बनाने के लिए केंद्र सरकार लगातार अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा ले रही है। इसी क्रम में राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेटेड मशीन-एडेड कंस्ट्रक्शन (AI-MC) तकनीक को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शामिल किया गया था। दुनिया भर में अपनी सटीकता और गुणवत्ता के लिए सराही जाने वाली इस हाई-टेक तकनीक को भारत में सबसे पहले लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के निर्माण कार्य में आजमाया गया था। लेकिन, इस महत्वाकांक्षी परियोजना में जिस प्रकार की तकनीकी खामियां और हेरफेर के मामले सामने आए हैं, उसने पूरे तंत्र को चौंका दिया है। एआई जैसी पारदर्शी और उन्नत प्रणाली के साथ ठेकेदार फर्म द्वारा कथित रूप से आंखमिचौनी करने और डेटा में बदलाव करने के खुलासे के बाद अब देश भर की 26 अन्य महत्वपूर्ण हाईवे परियोजनाओं पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चुने गए लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर उठे गंभीर सवाल
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के निर्माण की शुरुआत वर्ष 2022-23 के दौरान प्रमुख निर्माण कंपनी पीएनसी इन्फ्राटेक (PNC Infratech) द्वारा की गई थी। केंद्र सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने इस सामरिक और व्यावसायिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग को देश का पहला ऐसा पायलट प्रोजेक्ट बनाया, जहाँ एआई-एमसी तकनीक का पूर्ण उपयोग सड़क निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए किया जाना था। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सड़क निर्माण के दौरान मिट्टी की प्रत्येक परत का संपीड़न (कम्प्रेसन) निर्धारित मानकों के अनुरूप हो, निर्माण कार्य तय समय सीमा के भीतर पूरा हो और मानवीय त्रुटियों या भ्रष्टाचार की गुंजाइश को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके। चूंकि यह तकनीक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद सफल मानी जाती है, इसलिए सरकार ने इसके परिणामों को पूरी तरह से भरोसेमंद माना और वर्ष 2025 में देश भर के अन्य 26 नए हाईवे प्रोजेक्ट्स में भी इस तकनीक के अनिवार्य उपयोग का बड़ा आदेश जारी कर दिया।
ठेकेदारों ने एआई तकनीक और डेटा में कैसे की सेंधमारी?
सबसे बड़ा और हैरान करने वाला सवाल यह है कि अत्याधुनिक सेंसर, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और ऑटोमेटेड उपकरणों पर आधारित इस तकनीक में आखिरकार हेरफेर कैसे संभव हो गई? एनएचएआइ (NHAI) के वरिष्ठ अधिकारी भी इस बात से सकते में हैं कि ठेकेदार फर्म ने इस प्रणाली को किस हद तक प्रभावित किया। शुरुआती जांच में यह पड़ताल की जा रही है कि क्या निर्माण के दौरान एआई-एमसी तकनीक का वास्तव में ग्राउंड लेवल पर पूरा इस्तेमाल किया गया था या केवल कागजों में खानापूर्ति की गई? इसके अलावा, यह भी जांच का मुख्य विषय है कि क्या इस तकनीक के जरिए सर्वर पर साझा किए जाने वाले रियल-टाइम डेटा में किसी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप (Human Intervention) किया गया था या सॉफ्टवेयर के एल्गोरिदम को चकमा देने के लिए वैकल्पिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया। निगरानी प्रणालियों में कहां और कैसे चूक हुई, इसकी गहन समीक्षा के लिए तकनीकी विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय टीम जुटी हुई है, जिसकी रिपोर्ट आने के बाद कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।
देश भर की 26 अन्य हाईवे परियोजनाओं पर बढ़ा निगरानी का दबाव
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सामने आई इस बड़ी तकनीकी चूक और डेटा से छेड़छाड़ के मामलों ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के कान खड़े कर दिए हैं। इस घटनाक्रम ने उन 26 अन्य राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के लिए समय रहते खतरे की घंटी बजा दी है, जिन्हें एआई-एमसी तकनीक के आधार पर ही विकसित किया जाना तय किया गया था। हालांकि मंत्रालय और एनएचएआइ ने इन सभी परियोजनाओं को रद्द करने के बजाय उनकी निगरानी के नियमों को और अधिक कठोर तथा पारदर्शी बना दिया है। नए और सख्त दिशा-निर्देशों के अनुसार अब 20 किलोमीटर से अधिक लंबाई वाले सभी हाईवे प्रोजेक्ट्स में इस तकनीक का उपयोग अनिवार्य होगा और निर्माण के दौरान हर एक परत (लेयर) के बिछने का डेटा पूरी तरह से रियल-टाइम आधार पर केंद्रीय सर्वर पर साझा किया जाएगा। पहले से चिन्हित कई ऐसे प्रोजेक्ट भी हैं जो 20 किलोमीटर से छोटे हैं, लेकिन अब उन पर भी निगरानी की यही कड़ी शर्तें लागू कर दी गई हैं ताकि देश के किसी भी अन्य हिस्से में जनता के धन और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ न हो सके।
गुणवत्ता से समझौता करने वालों पर होगी सख्त कार्रवाई
सड़क निर्माण क्षेत्र में एआई तकनीक के दुरुपयोग का यह मामला अपने आप में एक अनूठा और गंभीर सबक है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि केवल तकनीक का आ जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके क्रियान्वयन और ऑडिट की पारदर्शी व्यवस्था होना भी उतना ही आवश्यक है। एनएचएआइ के सूत्रों का कहना है कि लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे मामले में पीएनसी इन्फ्राटेक की भूमिका की पूरी पारदर्शिता के साथ जांच की जा रही है और यदि रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की वित्तीय या तकनीकी गड़बड़ी साबित होती है, तो कंपनी के खिलाफ अनुबंध के नियमों के तहत बेहद कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि देश के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में किसी भी स्तर पर लापरवाही या धोखाधड़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और भविष्य के सभी प्रोजेक्ट्स को फुल-प्रूफ सुरक्षा घेरे में चलाया जाएगा ताकि आम जनता को विश्वस्तरीय और सुरक्षित सड़कें मिल सकें।