Monsoon Rain Deficit Update: अगस्त में झमाझम बारिश के बाद अचानक छाया सूखा, देश में मॉनसून का घाटा फिर बढ़कर 10.5% पर पहुंचा; खरीफ फसलों पर संकट के बादल

Monsoon Rain Deficit Update: अगस्त में झमाझम बारिश के बाद अचानक छाया सूखा, देश में मॉनसून का घाटा फिर बढ़कर 10.5% पर पहुंचा; खरीफ फसलों पर संकट के बादल

देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (Southwest Monsoon) के मिजाज में लगातार आ रहे उतार-चढ़ाव ने एक बार फिर मौसम विज्ञानियों, कृषि विशेषज्ञों और किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अगस्त महीने के शुरुआती सप्ताह में देश के कई हिस्सों में हुई झमाझम और मूसलाधार बारिश ने मानसूनी घाटे को काफी हद तक पाट दिया था, लेकिन इसके तुरंत बाद मॉनसून की ट्रफ लाइन (Monsoon Trough) के हिमालय की तलहटी की ओर खिसक जाने और मानसूनी हवाओं के कमजोर पड़ने से देश के मैदानी इलाकों में बारिश का लंबा 'ड्राई स्पेल' (Dry Spell) शुरू हो गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा संकलित आंकड़ों के अनुसार, इस शुष्क दौर के चलते देश में संचयी वर्षा का घाटा एक बार फिर बढ़कर 10.5 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। अगस्त के इस अहम पखवाड़े में बारिश थमने से उत्तर, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के कई प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।

अगस्त में मॉनसून ब्रेक और बारिश में अचानक आई भारी गिरावट

मौसम विभाग के अनुसार, 1 जून से शुरू हुए दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन में जुलाई के महीने में अपेक्षाकृत बेहतर बारिश दर्ज की गई थी और अगस्त के पहले सप्ताह में भी बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दबाव के क्षेत्रों ने मध्य भारत में अच्छी बारिश कराई थी। हालांकि, पिछले कुछ दिनों से मॉनसून प्रणाली पर 'मॉनसून ब्रेक' (Monsoon Break Condition) की स्थिति हावी हो गई है। मौसम वैज्ञानिकों का विश्लेषण है कि जब मॉनसून ट्रफ उत्तर की ओर शिफ्ट हो जाती है, तो देश के बड़े मैदानी भूभाग में मानसूनी गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं। इसके चलते केवल पूर्वोत्तर राज्यों और हिमालयी तराई क्षेत्रों में बारिश सीमित रह जाती है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे विशाल कृषि उत्पादक राज्यों में तेज धूप और भारी उमस के साथ सूखा गहराने लगता है।

राज्यों में बारिश का क्षेत्रीय असंतुलन और सूखे का दायरा

देशभर में बारिश का वितरण इस सीजन में अत्यधिक असमान बना हुआ है। जहां एक तरफ हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में स्थानीय स्तर पर अत्यधिक बारिश और भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गईं, वहीं देश के मुख्य खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में बादलों की भारी बेरुखी देखने को मिल रही है।

  • गंगा के मैदानी इलाके: उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के गांगेय क्षेत्र और झारखंड में सामान्य से 25 से 40 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे इन राज्यों के कई जिलों में जलस्रोतों का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है।

  • प्रायद्वीपीय और दक्षिणी भारत: आंतरिक कर्नाटक, रायलसीमा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश में 20 से 35 प्रतिशत तक की भारी कमी बनी हुई है।

  • मध्य और पश्चिमी भारत: महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों के साथ-साथ पश्चिमी मध्य प्रदेश में भी पिछले एक पखवाड़े से लगातार शुष्क मौसम के कारण नमी का स्तर तेजी से घटा है।

खरीफ फसलों, धान की रोपाई और कृषि अर्थव्यवस्था पर सीधा असर

अगस्त का महीना खरीफ सीजन की फसलों के विकास के लिए सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय धान (Paddy), सोयाबीन, मक्का, कपास, अरहर, मूंग और गन्ने की फसलें बढ़वार के दौर में होती हैं और उन्हें लगातार पर्याप्त नमी व सिंचाई की आवश्यकता होती है। बारिश में 10.5 प्रतिशत का यह कुल घाटा और लंबे समय तक बना सूखा कई गंभीर चुनौतियां खड़ी कर रहा है।

  • धान की खड़ी फसलों पर संकट: जिन किसानों ने नलकूपों या सीमित सिंचाई के सहारे धान की रोपाई पूरी कर ली थी, वे अब खेतों में दरारें पड़ने और पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। समय पर बारिश न होने से फसलों में कीटों का प्रकोप और पीलापन बढ़ने की आशंका है।

  • दलहन और तिलहन की पैदावार पर असर: मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सोयाबीन तथा उड़द-मूंग की फसलों को फलियों के विकास के लिए तत्काल वर्षा की दरकार है। बारिश में देरी होने से प्रति एकड़ उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट आने का जोखिम बन गया है।

  • भूजल और बिजली की खपत में उछाल: नहरों और तालाबों में पानी सूखने के कारण किसान पूरी तरह ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भर हो गए हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है और भूजल स्तर में भारी गिरावट आ रही है।

जलाशयों में घटता जलस्तर और पेयजल की संभावित किल्लत

केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा देश के 150 प्रमुख जलाशयों (Reservoirs) की साप्ताहिक निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में कई प्रमुख बांधों में पानी का कुल भंडारण उनकी क्षमता और ऐतिहासिक औसत से नीचे दर्ज किया जा रहा है। विशेष रूप से दक्षिणी और पूर्वी भारत के जलाशयों में पानी की आवक बेहद कमजोर रही है। यदि अगस्त के शेष दिनों और सितंबर के पहले पखवाड़े में व्यापक मानसूनी बारिश नहीं होती है, तो इसका सीधा असर न केवल आगामी रबी फसलों की बुआई पर पड़ेगा, बल्कि कई बड़े शहरों और कस्बों में अगले साल गर्मियों के लिए पेयजल आपूर्ति का संकट भी खड़ा हो सकता है।

आगामी दिनों के लिए मौसम विभाग का पूर्वानुमान और राहत की उम्मीद

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वरिष्ठ मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि बंगाल की खाड़ी के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में अगले 48 से 72 घंटों के भीतर एक नया साइक्लोनिक सर्कुलेशन (Cyclonic Circulation) और कम दबाव का क्षेत्र सक्रिय होने की संभावना है। इस नई मौसमी प्रणाली के विकसित होने से मॉनसून ट्रफ के एक बार फिर दक्षिण की ओर खिसकने के अनुकूल संकेत मिल रहे हैं। इसके प्रभाव से 18 से 22 अगस्त के दौरान ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बारिश का एक नया दौर शुरू हो सकता है, जिससे मौजूदा मानसूनी घाटे में आंशिक सुधार की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, मौसम विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि सीजन के समग्र संतुलन को बनाए रखने के लिए पूरे देश में व्यापक और निरंतर मानसूनी गतिविधियों की सख्त आवश्यकता होगी।

Latest Posts