सिर्फ 15 घंटे चली लोकसभा: एंटी-पेपर लीक से 'केरलम' तक, बिना चर्चा के धड़ाधड़ पास हुए कई अहम बिल
भारतीय संसद के कामकाज और उसकी कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में समाप्त हुए संसद के सत्र के दौरान लोकसभा का हाल ऐसा रहा कि महज 18 दिनों की कुल अवधि में सदन की कार्यवाही कुल मिलाकर सिर्फ 15 घंटे ही चल पाई। इस भारी हंगामे और गतिरोध के बीच देश से जुड़े कई बेहद संवेदनशील और बड़े विधेयकों (Bills) को बिना किसी सार्थक चर्चा या डिबेट के ही जबरन पास करा लिया गया। इसमें एंटी-पेपर लीक कानून से लेकर राज्य के नाम बदलने से जुड़े 'केरलम' जैसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव और बिल भी शामिल रहे, जिन पर देश की जनता की निगाहें टिकी हुई थीं।
हंगामे की भेंट चढ़ा संसद का सत्र, 18 दिनों में सिर्फ 15 घंटे कामकाज
संसदीय लोकतंत्र में संसद को देश की सबसे बड़ी पंचायत माना जाता है, जहां जनता के मुद्दों पर खुलकर बहस होनी चाहिए और कानूनों की समीक्षा की जानी चाहिए। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक हालात और सत्तापक्ष-विपक्ष के बीच तीखे टकराव के चलते इस सत्र का अधिकांश समय नारेबाजी और हंगामे की भेंट चढ़ गया। हालात यह रहे कि करीब 18 दिनों तक चले इस सत्र में दोनों पक्षों के बीच सहमति न बन पाने के कारण लोकसभा की कुल कामकाज की अवधि सिमटकर मात्र 15 घंटे के आसपास ही रह गई। इस न्यूनतम समय में सदन चलाना सरकार और पीठासीन अधिकारियों के सामने भी एक बड़ी चुनौती साबित हुआ।
बिना बहस के पास हुए देश को प्रभावित करने वाले बड़े बिल
जब सदन में चर्चा का समय ही नहीं बचा, तो सरकार के पास विधायी कार्यों को पूरा करने के लिए बिना बहस के बिल पारित कराने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। इस दौरान देश के युवाओं के भविष्य से जुड़े 'एंटी-पेपर लीक' (Anti-Paper Leak) जैसे कड़े और जरूरी कानूनों को बिना व्यापक चर्चा के मंजूरी दे दी गई। इसके अलावा केरल राज्य का नाम आधिकारिक रूप से बदलकर 'केरलम' (Keralam) करने से जुड़ा प्रस्ताव और अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक विधिवत बिल भी बिना किसी व्यापक संशोधन या मंथन के सदन में ध्वनिमत से पास कर दिए गए। जानकारों का मानना है कि महत्वपूर्ण विधेयकों का इस तरह जल्दबाजी में पास होना लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंता का विषय है।
लोकतंत्र के लिए चिंता का बड़ा सबब
संसद में चर्चा के बिना कानून बनने की यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है, जो राजनीतिक विश्लेषकों और संविधानविदों के बीच चर्चा का मुख्य केंद्र बन गई है। जब जनप्रतिनिधि ही सदन के पटल पर अपनी बात नहीं रख पाते और बिना बहस के कानून देश पर लागू होने लगते हैं, तो उससे जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होता है। इस सत्र के दौरान महज 15 घंटे की कार्यप्रणाली ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे राजनेता देश के जरूरी मुद्दों पर गंभीर संवाद करने से कतराने लगे हैं।