बीजेपी ने पूर्व डीसी देबाशीष शर्मा को बनाया उम्मीदवार, पार्टी ज्वाइन करने के सिर्फ चार दिन बाद मिला बड़ा टिकट
भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है, खासकर पूर्वोत्तर के राज्य असम में राजनीतिक समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने असम की बेहद अहम मानी जाने वाली नौगांव लोकसभा सीट पर होने वाले आगामी उपचुनाव के लिए अपने उम्मीदवार के नाम का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। शुक्रवार को पार्टी द्वारा जारी की गई सूची के अनुसार, हाल ही में भगवा दल का दामन थामने वाले पूर्व प्रशासनिक अधिकारी देबाशीष शर्मा को नौगांव लोकसभा उपचुनाव के लिए पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार बनाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि देबाशीष शर्मा ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने से महज चार दिन पहले ही भाजपा की सदस्यता ली थी, और इतनी जल्दी पार्टी द्वारा उन पर भरोसा जताया जाना राजनीतिक हलकों में खासी चर्चा का विषय बन गया है। इस सीट पर राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प होने की उम्मीद है, क्योंकि यह उपचुनाव महज एक साधारण चुनाव नहीं बल्कि राज्य के राजनीतिक भविष्य और क्षेत्रीय प्रभुत्व की एक बड़ी लड़ाई बनता जा रहा है, जिस पर देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों की पैनी नजर टिकी हुई है।
प्रद्युत बोरदोलोई के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर 6 अक्टूबर को होगा मतदान
असम की नौगांव लोकसभा सीट का यह उपचुनाव राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस निर्वाचन क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यह सीट कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रद्युत बोरदोलोई के इस्तीफे के कारण रिक्त हुई थी, जिन्होंने वर्ष 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से शानदार जीत हासिल की थी। हालांकि, राजनीतिक समीकरणों और समय के चक्र के साथ बदलाव का दौर जारी रहा, और बाद में प्रद्युत बोरदोलोई से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच यह सीट खाली हो गई, जिसके बाद अब चुनाव आयोग ने यहां उपचुनाव कराने का ऐलान किया है। निर्वाचन आयोग के तय कार्यक्रम के अनुसार, नौगांव लोकसभा सीट पर आगामी 6 अक्टूबर को मतदान संपन्न कराया जाएगा, जबकि इसके नतीजे 9 अक्टूबर को वोटों की गिनती के बाद सामने आएंगे। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही असम के इस हिस्से में सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है और ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों तक चुनावी रैलियों, बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। भाजपा ने देबाशीष शर्मा को मैदान में उतारकर यह संकेत दे दिया है कि वे इस सीट को जीतने के लिए पूरी ताकत झोंकने के मूड में हैं, वहीं विपक्षी दल भी इस मुकाबले को एक कांटे की टक्कर में बदलने के लिए अपनी पूरी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं।
कौन हैं देबाशीष शर्मा? प्रशासनिक सेवा से राजनीति के मैदान तक का सफर
नौगांव सीट से भाजपा के टिकट पर चुनावी दूनिया में कदम रखने वाले देबाशीष शर्मा का परिचय केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक बेहद अनुभवी और मंजे हुए पूर्व प्रशासनिक अधिकारी का है। अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के साथ-साथ पब्लिक रिलेशंस में पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले देबाशीष शर्मा ने अपने करियर की शुरुआत प्रशासनिक सेवा के माध्यम से की थी। वर्ष 1992 में वह असम सिविल सेवा (ACS) में शामिल हुए थे, और उनकी सबसे पहली पोस्टिंग बारपेटा जिले में हुई थी। अपने लंबे और बेदाग प्रशासनिक करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों को संभाला है। उन्होंने असम के तत्कालीन राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. सिन्हा के विशेष अधिकारी (Special Officer) के रूप में भी बहुत करीब से काम किया था। इसके अलावा, मुंबई स्थित असम भवन के डिप्टी रेजिडेंट कमिश्नर के रूप में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी थीं, जहां उन्होंने देश की वित्तीय राजधानी में असम सरकार के हितों का प्रतिनिधित्व किया था। गुवाहाटी म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के कमिश्नर और मोरीगांव जिले के जिला कमिश्नर के रूप में भी उनका कार्यकाल काफी चर्चा में रहा था। प्रशासनिक महकमे में अपनी एक अलग और सख्त कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले देबाशीष शर्मा ने नौगांव के जिला कमिश्नर के पद पर रहते हुए ही अपने पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस (VRS) लिया था, जिसके बाद उन्होंने औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश करने का साहसी निर्णय लिया।
महज चार दिन पहले भाजपा में हुए थे शामिल, प्रदेश अध्यक्ष ने दिलाई थी सदस्यता
प्रशासनिक सेवा से राजनीति के इस नए सफर की शुरुआत करते हुए देबाशीष शर्मा ने महज चार दिन पहले यानी 8 सितंबर को गुवाहाटी स्थित मुख्य भाजपा कार्यालय में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने उन्हें औपचारिक रूप से भाजपा का दुपट्टा पहनाकर और पार्टी की सदस्यता दिलाकर उनका स्वागत किया था। इस ज्वाइनिंग समारोह के दौरान असम सरकार के कई वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री और भाजपा के तमाम दिग्गज नेता मौजूद रहे थे, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि पार्टी के भीतर उन्हें कितना महत्व दिया जा रहा है। हालांकि, राजनीति में आने के साथ ही उन्हें कुछ राजनीतिक विरोधियों के तीखे तेवरों का भी सामना करना पड़ा है। हाल ही में कांग्रेस सांसद रकीबुल हुसैन ने असम के मुख्य चुनाव अधिकारी के पास एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी इस शिकायत में उन्होंने नौगांव के जिला कमिश्नर के रूप में देबाशीष शर्मा के कार्यकाल के दौरान लिए गए विभिन्न प्रशासनिक फैसलों की गहन समीक्षा करने और उनके खिलाफ उचित कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई करने की मांग की थी। मुख्य चुनाव अधिकारी ने उस शिकायत को आवश्यक कार्रवाई और दिशा-निर्देशों के लिए सीधे चुनाव आयोग के पास भेज दिया है। इन तमाम राजनीतिक उठापटक, शिकायतों और चर्चाओं के बीच देबाशीष शर्मा का चुनावी मैदान में उतरना असम की राजनीति में एक नया रोमांच पैदा कर रहा है।
सामाजिक कार्य और 'दीपशिखा' संस्था के जरिए जनसेवा का पुराना नाता
राजनीति और प्रशासन के गलियारों के अलावा देबाशीष शर्मा की एक और बड़ी पहचान एक संवेदनशील सामाजिक कार्यकर्ता और परोपकारी इंसान के रूप में भी रही है। वह समाज के सबसे कमजोर और जरूरतमंद वर्ग के लिए लगातार काम करते रहे हैं। विशेष तौर पर, वह कैंसर जैसी लाइलाज और भयानक बीमारी से जूझ रहे मरीजों की सहायता के लिए समर्पित प्रसिद्ध कैंसर देखभाल संस्था 'दीपशिखा' के संस्थापक चेयरमैन और मुख्य ट्रस्टी हैं। उन्होंने अपनी इस संस्था के माध्यम से न केवल असम बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के हजारों कैंसर रोगियों और उनके परिवारों को चिकित्सीय सहायता, मानसिक संबल और आश्रय प्रदान करने का सराहनीय कार्य किया है। एक सिविल सेवक के रूप में जनता की सेवा करने के बाद अब वह सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ राजनीतिक मंच से सीधे जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत करने निकल पड़े हैं। प्रशासनिक अनुभव की गहराई, सामाजिक कार्यों का लंबा अनुभव और सत्ताधारी दल भाजपा का मजबूत संगठनात्मक समर्थन—ये तमाम कारक मिलकर देबाशीष शर्मा के चुनावी भविष्य की दिशा तय करेंगे। नौगांव लोकसभा उपचुनाव के नतीजे आगामी 9 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे, जो यह तय करेंगे कि जनता ने पूर्व डीसी के इस नए राजनीतिक प्रयोग पर अपनी मुहर लगाई है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इस उपचुनाव ने असम की राजनीति में एक नए और दिलचस्प अध्याय की शुरुआत कर दी है।