'Gen Z' का लेबल छोड़िए, देश के युवा 'अमृत पीढ़ी' हैं: मीनाक्षी लेखी का बड़ा बयान
भारतीय राजनीति और सामाजिक परिदृश्य में अक्सर युवाओं की भूमिका को लेकर नए-नए विचार और परिभाषाएं सामने आती रहती हैं। इसी क्रम में देश की जानी-मानी राजनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने युवाओं को संबोधित करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और वैचारिक बयान दिया है। उन्होंने पश्चिमी देशों से आयातित 'जेन जी' (Gen Z) जैसे फैशनेबल और आधुनिक लेबलों को खारिज करते हुए देश के युवाओं को 'अमृत पीढ़ी' की संज्ञा दी है। मीनाक्षी लेखी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के मकड़जाल और लगातार बनती जा रही रील-बाजी (Reels culture) की संस्कृति में उलझकर रह गई है। उन्होंने सोशल मीडिया की इस अंधी दौड़ को आधुनिक समाज का 'नया अफीम' करार दिया है, जो युवाओं की ऊर्जा, फोकस और रचनात्मकता को भीतर ही भीतर दीमक की तरह खोखला कर रहा है।
पश्चिमी लेबलों से बाहर निकलकर अपनी मौलिक पहचान को पहचानें युवा
अपने संबोधन के दौरान मीनाक्षी लेखी ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारतीय युवाओं को खुद को पश्चिमी मापदंडों या 'जेन जी' जैसे कृत्रिम लेबलों के खांचे में फिट करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे महान सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत वाले देश के युवा किसी पश्चिमी परिभाषा के मोहताज नहीं हैं। देश का हर युवा अपनी क्षमता, मेधा और देशप्रेम के बल पर एक नई इबारत लिखने की ताकत रखता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे विदेशी प्रवृत्तियों की नकल करने के बजाय अपनी खुद की मजबूत पहचान बनाएं और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के साथ गहराई से जुड़े रहें। जब युवा अपनी मौलिकता को पहचान लेते हैं, तभी वे राष्ट्र निर्माण में अपना सबसे बेहतरीन और सार्थक योगदान दे सकते हैं।
सोशल मीडिया: आधुनिक युग का नया अफीम और भ्रामक दुनिया
आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन और इंटरनेट हर हाथ की पहुंच में हैं, लेकिन इसका नकारात्मक पहलू यह है कि युवा वर्ग वर्चुअल दुनिया की चमक-दमक में वास्तविक जीवन से दूर होता जा रहा है। मीनाक्षी लेखी ने बेहद तल्ख अंदाज में कहा कि आज सोशल मीडिया पर लाइक, शेयर और व्यूज पाने की अंधी होड़ ने युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। लोग दिन-रात छोटी-छोटी रील्स बनाने और देखने में अपना बेशकीमती वक्त बर्बाद कर रहे हैं। उन्होंने इस डिजिटल लत को 'आधुनिक युग का अफीम' बताते हुए चेतावनी दी कि यह न केवल मानसिक एकाग्रता को कमजोर कर रहा है, बल्कि युवाओं की वैचारिक क्षमता और धैर्यर को भी खत्म कर रहा है। एक ऐसी पीढ़ी जो देश का भविष्य तय करने वाली हो, यदि वह केवल वर्चुअल लाइक्स की मोहताज बन जाए, तो यह समाज के लिए एक चिंता का विषय है।
'अमृत पीढ़ी' होने का अहसास और देश के विकास में जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के युवाओं को 'अमृत काल' के दौर में 'अमृत पीढ़ी' कहे जाने के संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए लेखी ने कहा कि वर्तमान युवाओं का यह समय भारत के इतिहास का सबसे स्वर्णिम और निर्णायक कालखंड है। उन्होंने युवाओं को याद दिलाया कि उनके कंधों पर अगले 25 वर्षों में भारत को एक विकसित राष्ट्र (Developed Nation) बनाने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। स्टार्टअप्स, स्पेस टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, कृषि और उद्यमिता के क्षेत्र में आज भारतीय युवा वैश्विक स्तर पर अपनी धमक छोड़ रहे हैं। ऐसे में, यदि युवा अपनी ऊर्जा को सोशल मीडिया की फालतूचियों में गंवा देंगे, तो वे अपने महान लक्ष्यों से भटक जाएंगे। 'अमृत पीढ़ी' होने का मतलब है कि हर युवा अपनी पूरी क्षमता का उपयोग देश की तरक्की और खुद के उज्जवल भविष्य के निर्माण में करे।
रील-बाजी से मुक्ति और वास्तविक धरातल पर काम करने का संकल्प
इस वैचारिक और प्रेरणादायक संबोधन के अंत में मीनाक्षी लेखी ने युवाओं से यह अपील की कि वे दिखावे की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर धरातल पर वास्तविक सफलता हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि किताबें पढ़ने, खेलकूद में हिस्सा लेने, सामाजिक सरोकारों से जुड़ने और अपने स्किल को अपग्रेड करने का जो आनंद है, वह कभी भी किसी वायरल वीडियो या रील से नहीं मिल सकता। जीवन में शॉर्टकट से कभी स्थायी सफलता नहीं मिलती, उसके लिए कठिन परिश्रम और अनुशासन की आवश्यकता होती है। यदि देश का युवा वर्ग इस बात को गहराई से समझ ले और सोशल मीडिया की इस गुलामी से खुद को आजाद कर ले, तो दुनिया की कोई भी ताकत भारत को विश्व गुरु बनने से नहीं रोक सकती।